
दिव्या सिंह
ज़ीनत पेशे से इस्लामिक स्टडीज़ की लेक्चरर थी, लेकिन शौक था बागबानी का। जब भी फुर्सत मिलती, बच्चों और पति के बाद वह पेड़-पौधों की देखरेख में लग जाती। ज़ीनत चाहती तो माली रख सकती थी, लेकिन उसे खुद पौधों को पानी देना और उनकी सेवा करना रूहानी सुकून देता था।
आज भी उसे वे दिन याद आते हैं, जो किसी की ज़िंदगी में दोबारा नहीं आते—बचपन के दिन, जिनकी सिर्फ़ यादें रह जाती हैं। रविवार ही एक दिन मिलता था खेल-कूद और धमाचौकड़ी के लिए, लेकिन ज़ीनत को इन सबसे अलग पूरा दिन गार्डन में बिताना ज़्यादा पसंद था। कई बार अम्मी की फटकार और पिटाई भी खानी पड़ी, क्योंकि वह मिट्टी और कीचड़ में सनी रहती थी।
स्कूल से घर आने के बाद बाकी दिनों में भी ज़ीनत आँख बचाकर बगीचे में चली जाती। उसे गुड़िया-गुड़ियों से ज़्यादा पेड़-पौधे, मिट्टी की सौंधी खुशबू और फूल भाते थे। धीरे-धीरे दिन गुज़रते गए और ज़ीनत पूर्णिमा के चाँद की तरह निखरती रही।
ज़ीनत की अम्मी ने बहुत मुश्किलों से उसे पाला था। उसके वालिद का इंतकाल तब हो गया था, जब वह तीन-चार साल की थी। उसकी माँ ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। बस क़ुरआन शरीफ़ पढ़ लेती थीं, अपना नाम लिख लेती थीं और घर का थोड़ा-बहुत हिसाब-किताब कर लेती थीं।
कम पढ़ी-लिखी होने की वजह से जो मुश्किलें शबनम ने झेली थीं, वे नहीं चाहती थीं कि उनकी इकलौती बेटी भी वही परेशानियाँ झेले। इसलिए वह लोगों के घर मीलाद पढ़तीं, कपड़े सिलतीं और बच्चों को क़ुरआन पढ़ातीं। जो कमाई होती, वह सब ज़ीनत की पढ़ाई पर खर्च कर देतीं।
ज़ीनत पढ़ाई में भी बहुत अच्छी थी। समय गुज़रता रहा और एक दिन वह आया, जब ज़ीनत ने इस्लामिक स्टडीज़ में पूरे ज़िले में टॉप किया। बूढ़ी माँ शबनम खुशी से फूली नहीं समाईं।
अब ज़ीनत को नौकरी की कोई कमी नहीं थी, लेकिन शबनम अभी भी मीलाद पढ़तीं और कपड़े सिलती थीं। यह बात अब ज़ीनत को अच्छी नहीं लगती थी।
“अम्मी, अब मैं इस क़ाबिल हूँ कि आपका और घर का खर्च उठा सकूँ। आप ये सब छोड़ दीजिए।”
शबनम मुस्कुराईं, “बेटा, हाथ-पैर चलते रहें तो अच्छा है। चार पैसे भी आ जाते हैं।”
आख़िरकार ज़ीनत की ज़िद के आगे उन्होंने अपना काम कम कर दिया।
एक दिन कुछ लोग घर आए। ज़ीनत सलाम करके अंदर चली गई। उनके जाने के बाद शबनम ने बताया कि वे फ़रीद के वालिद, अम्मी और बहन थे—रिश्ता लेकर आए थे।
ज़ीनत चौंकी, “फ़रीद? कौन फ़रीद?”
शबनम मुस्कुराकर बोलीं, “आगे चलकर सब बताऊँगी।”
समय बीता और ज़ीनत की शादी फ़रीद से हो गई।
फ़रीद का कपड़ों का एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट का बिज़नेस था। एक दिन वह बहुत परेशान होकर घर लौटा। दुबई के कस्टमर्स ने लाखों रुपये का माल लेने से इंकार कर दिया था। कर्ज़ भी चढ़ चुका था।
ज़ीनत ने उसे ढाढ़स बँधाया, “अल्लाह ने अब तक दिया है, आगे भी देगा। हम सब संभाल लेंगे।”
उसी दौरान उसने याद दिलाया कि अगले दिन, 26 नवंबर 2008, उनकी शादी की सालगिरह है।
बेटा रौशन भी बहुत उत्साहित था। उसने कहा, “हम मुंबई के सबसे बड़े होटल में पार्टी करेंगे।”
आख़िरकार तय हुआ कि वे ताज होटल में डिनर करेंगे।
रात करीब आठ बजे वे तैयार थे। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी—मुंबई में गोलीबारी। पड़ोसी शर्मा जी ने सांप्रदायिक टिप्पणी की, लेकिन ज़ीनत ने शांत रहकर जवाब दिया।
कुछ देर बाद वे ताज होटल पहुँच गए। रात लगभग 10 बजकर 43 मिनट पर फ़रीद के दोस्त का फोन आया।
“मुंबई में आतंकी हमला हुआ है।”
अचानक होटल में भगदड़ मच गई। गोलियों की आवाज़ें, धमाके और चीख-पुकार चारों ओर गूँजने लगीं। होटल का स्टाफ लोगों को एक हॉल में इकट्ठा कर रहा था। अँधेरे में लोग दहशत से काँप रहे थे।
कुछ लोग सांप्रदायिक टिप्पणियाँ कर रहे थे। ज़ीनत और फ़रीद अपने बेटे को सीने से लगाए खामोशी से खड़े थे।
होटल स्टाफ लोगों को सुरक्षित जगह पहुँचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन तभी आतंकवादी हॉल में दाखिल हो गए।
अँधेरे में गोलियाँ चलीं। दीपक सिंह की मौके पर ही मौत हो गई। उनकी पत्नी बिलख-बिलखकर रो रही थीं।
ज़ीनत ने आतंकियों से रहम की भीख माँगी, “अल्लाह के वास्ते मेरे पति और बच्चे को छोड़ दो।”
एक आतंकी ने लाइटर जलाया। उसका भयावह चेहरा और हाथ में थमा हथियार साफ़ दिखाई दे रहा था।
गोली चली।
फ़रीद घायल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा।
ज़ीनत चीख उठी, “आज हमारी शादी की सालगिरह है… मुझे मार दो, इन्हें छोड़ दो।”
आतंकी ने उसे थप्पड़ मारते हुए कहा, “हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हमारा दुश्मन है।”
ज़ीनत ने काँपती आवाज़ में कहा, “इस्लाम बेगुनाहों के क़त्ल की इजाज़त नहीं देता।”
तभी ज़ोरदार धमाका हुआ। बाहर आग की लपटें दिखाई दीं।
और फिर…
गहरी खामोशी छा गई।
