
नीरजा कृष्णा, पटना
वह बहुत हैरान-परेशान हो गई, जब मालूम हुआ कि उनकी प्रिय सखी अचानक सब छोड़-छाड़ कर सपरिवार विदेश से वापस आ गई है।
“अरे! अचानक क्या हो गया? कितनी खुश थी। जाते समय कह रही थी, ‘यहाँ इंडिया में रखा ही क्या है! हर चीज़ के लिए हाय-तौबा! वहाँ जाकर चैन की साँस लेंगे’, आदि-आदि।”
वह उत्सुकता दबा नहीं पाई और मिलने, या यूँ कहिए लौट आने का रहस्य जानने के लिए उसके घर की घंटी दबा ही दी।
बहुत गर्मजोशी से गले मिली। बोली, “चल, बाहर बरामदे में बैठते हैं। अभी बिजली गायब है। दो घंटे से कटी हुई है। शायद कल आँधी में कहीं तार वगैरह टूट गए हैं।”
जानलेवा गर्मी के कारण हालत खराब थी। वह माँ का बनाया सुंदर-सा पंखा ले आई। तभी उसका छोटा बेटा जोश से चिल्लाया,
“मम्मा! लाइट आ गई।”
बस क्या था! जैसे बेदम देह में जान-सी आ गई।
“अरे रमुआ! जल्दी से पंप चालू कर, टंकी में पानी खत्म होने को है। और बेटा, आर.ओ. चला कर पानी की बोतलें भी भर ले। फ्रिज़ में ठंडा पानी नहीं है। अरे, अरे! पहले पानी का काम निपटा। लाइट का क्या भरोसा?”
जिस तरह की दौड़धूप और उछलकूद मची थी, देखकर वह हैरान-सी हो रही थी।
ड्राइवर के आने पर सखी बोली, “ज़रा मेरे साथ चौक बाज़ार चल, कुछ ज़रूरी सामान लेना है।”
वह पूरी फ़ुर्सत में थी, साथ हो ली। पर रास्ता पूरा जाम! पूरे दस मिनट बाद जाम खुलने पर गाड़ी आगे बढ़ी।
“वाह! कितनी भीड़ थी। लोगों में आगे निकलने का अदम्य उत्साह! वाह शीला! कितना मज़ा आया। वहाँ विदेश में लाइफ़ कितनी डल हो गई थी। न भीड़, न कोई जाम, न कोई उत्साह! वहाँ तो मरी लाइट एक मिनट को भी नहीं गायब होती थी। मशीन की तरह सब काम हो जाते थे। यहाँ जो भाग-दौड़ मचती है, उसका क्या कहना!”
“सच यार! वहाँ ज़िंदगी का उत्साह ही खत्म हो गया था। लाइफ़ विदाउट एक्साइटमेंट… मशीनी ज़िंदगी… उफ़!”
बस, उसको अपने सवालों का उत्तर मिल चुका था। वह अपने खोए हुए शहर में वापस आ गई थी।
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दिल से आभार