
डॉ. रत्ना मानिक
पापा के जाने के बाद किसी घाटी की समूची गहरी खामोशी मेरी माँ के वजूद में उतर आई थी… चेहरे पर थिरकता मातृत्व, दुलार भरी मुस्कान, आँखों से छलकता निर्झरणी-सा आशीर्वाद… सब पर मानो बर्फ़ की गहरी, मोटी, सख्त चादर जम गई थी।
किंतु मैं ठहरा पुरुष… इसलिए जीवन में पिता की रिक्तता को जल्द ही बिसरा कर खुद को समेट लिया और अपने करियर को शीर्ष पर पहुँचाने में दिन-रात एक करने लगा था।
मैं अपने ज़माने को धन्यवाद देता हूँ (आज का ज़माना… पति, पत्नी और घर के लोगों के बीच कलह, नफरत और ईर्ष्या से रिश्तों का हर दिन कत्ल होना मन को भीतर तक कंपा जाता है), क्योंकि ईश्वर की कृपा से मेरे ज़माने में जो मेरी जीवन-संगिनी मिली थी, वह सही मायने में जीवन-संगिनी का फ़र्ज निभा रही थी।
इसीलिए दिन भर की आपाधापी और ज़िम्मेदारी के बोझ से थका-हारा जब मैं घर आता, तो खाना परोसते-परोसते वह धीरे से माँ (अपनी सास) के प्रति अपनी चिंता व्यक्त कर देती।
माँ का दिन भर एक कमरे में खुद को कैद करके रहना, देर रात तक जागते रहना, न उससे, न पड़ोसियों से कोई बातचीत करना, किसी तरह बहुत ज़ोर-ज़बरदस्ती करने पर एक-आध रोटी खाकर अपने शरीर को ज़िंदा भर रखना…
मैं अपनी पत्नी गरिमा की बातों को सुनकर हाँ-हूँ में सिर हिला देता या “अच्छा, कल पक्का माँ से बात करूँगा” ऐसा कहकर कभी-कभार टाल भी देता था।
यूँ तो गरिमा अपनी तरफ़ से हर संभव कोशिश कर रही थी माँ को खुश रखने की, उनकी देखभाल में कोई कमी, कोई कसर न छोड़ रखने की, किंतु उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद माँ दिनों-दिन छीजती जा रही थीं।
अगले दिन ऑफिस निकलने से पहले मैंने गरिमा को बता दिया कि आज ऑफिस की एक इंपॉर्टेंट मीटिंग है और मुझे लौटने में काफ़ी देर हो जाएगी, तो वह खुद भी खा ले और माँ को भी खिलाकर सुला दे, मेरा इंतज़ार न करे।
मैं उस दिन तकरीबन रात के एक बजे घर लौटा था। घर में प्रवेश करते ही मेरी नज़र माँ के कमरे की ओर उठ गई। कमरे की बत्ती अभी तक जल रही थी। मेरे कदम खुद-ब-खुद माँ के कमरे की ओर मुड़ गए थे।
मैं किवाड़ की ओट लिए दम साधे अपनी माँ को देख रहा था… शायद… शायद महीनों बाद ठीक से देख रहा था… माँ को देखकर मैं खुद को धिक्कार उठा। आँखों से ग्लानि और पीड़ा की गर्म बूँदें गालों से होते हुए होठों के कोरों को नमकीन करने लगीं।
माँ! कितनी… कितनी कमज़ोर लग रही थीं और कितनी बूढ़ी भी… ओह! ये मैंने क्या कर दिया! मैंने… मैंने किस शीर्ष पर पहुँचने की ज़िद में माँ को अनदेखा कर दिया?
माँ के चेहरे पर पसरे मौत-से सन्नाटे को देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था।
रात के एक बजे माँ मेरी फोटो को कलेजे से लगाकर थपका रही थीं। लोरी गुनगुना कर सुला रही थीं और बीच-बीच में मेरी फोटो को देखकर दिलासा भी दे रही थीं.
“मेरा बच्चा डर गया? ना, मेरा बच्चा! माँ है न तुम्हारे पास! माँ की गोद में भला मेरे बच्चे को किसका डर? चलो-चलो, अब जल्दी से निन्नी कर लो! फिर सुबह पापा जी के साथ खेलना भी है न!”
माँ के जीवन में पसरे एकाकीपन के, एकांत के उस भयावह शोर से मेरा ज़िस्म मुर्दे की भाँति दरवाज़े से लगा अकड़ा रहा।
बचपन की हज़ार स्मृतियाँ आँखों में कौंध रही थीं और मेरे हृदय पर आरी चला रही थीं… जब एक डरा, सहमा बच्चा अपनी माँ के आँचल के चंदोवे में हमेशा सुकून से सोता रहा था।
मेरे होठों में अब भी एक नमकीन स्वाद घुल रहा था और धिक्कार मेरे कलेजे पर प्रहार कर रहा था।

मर्मस्पर्शी रचना👌 शब्द चयन 👌👌
भावनाओं को करीने से रखा आपने कहानी में