गोदना

आदिवासी गोदना से प्रेरित धरती पर उकेरी हरियाली, जंगल, नदियाँ और वृक्षों का प्रतीकात्मक कलात्मक दृश्य।

दोलन रॉय, संभाजीनगर (महाराष्ट्र)

जैसे आदिवासी कन्या
अपने तन पर गोदना गोदवाती है
स्मृतियों को, परंपराओं को,
अपनी पहचान को त्वचा में सहेज लेती है।
गले में हार,
पैरों में पाजेब,
बाजूबंद, कमरबंद, चूड़ियाँ
ये केवल आभूषण नहीं,
उसके जीवन की कथा हैं।
वैसे ही,
धरती की त्वचा पर भी
उगने चाहिए वृक्ष,
फैलनी चाहिए लताएँ,
लिपटनी चाहिए बेल-बूटियाँ,
मानो प्रकृति ने प्रेम से
अपना गोदना रच दिया हो।
उन्हें भी
गोदना की तरह ही
धरती के चमड़े में चिपक जाना चाहिए,
इतना गहरा कि समय भी
उन्हें मिटा न सके।
क्योंकि गोदना केवल सजावट नहीं होता,
वह साथ चलता है
सुख में, दुख में,
यौवन में, बुढ़ापे में,
जीवन के अंतिम पड़ाव तक।
जब तक आदिवासी स्त्रियाँ जीवित रहेंगी,
गोदना उनकी शोभा बनकर रहेगा;
और जब तक यह धरती जीवित है,
जंगल उसकी आत्मा बनकर रहने चाहिए।
धरती के निर्जन अंगों पर
हरे वृक्षों की रेखाएँ उकेरो,
नदियों की नीली लकीरें खींचो,
पहाड़ों के चिह्न बनाओ,
फूलों के बिंब सजाओ।
धरती!
तुम अपने शरीर में जंगलों को गहना बना लो,
अपने वक्ष पर साल और सागौन टाँक लो,
अपनी बाँहों में बाँस के वन पहन लो,
अपने माथे पर महुए का तिलक सजा लो।
पूरे देह में
हरियाली का गोदना गोद लो,
इतना गहरा, इतना स्थायी
कि कोई कुल्हाड़ी उसे मिटा न सके।
क्योंकि जंगल केवल पेड़ नहीं होते,
वे धरती की स्मृति हैं,
उसकी साँस हैं,
उसका सौंदर्य हैं,
उसका जीवन हैं।
धरती,
तुम गोदना गोद लो
जंगलों का गोदना,
नदियों का गोदना,
जीवन का गोदना।
गोदना गोद लो…
कि आने वाली पीढ़ियाँ
तुम्हारी देह पर उकेरी हुई
इस हरित कविता को पढ़ सकें।

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