तेरे होने, मेरे न होने के बीच

तेरे होने और मेरे न होने के बीच | एक प्रेम कविता

किरण सरावगी

तेरे होने, मेरे न होने के
बीच कुछ और भी है,
जो तुम्हें पसंद है।

बीती बातें, बीती रातें
और सुबह का हसीन मंज़र।

न तिलिस्म, न मायाजाल,
न कोई जादूगरी—
जानती हो ना?

तुम्हारे लबों की ख़ुशबू,
मद्धम हँसी,
तुम्हारी आँखों में लहकता काजल,
तुम्हारे गेसुओं में
चित्तौड़गढ़ के अश्व के चाबुक-सा बल
नहीं भूल पाता,
नहीं भूल पाता।

तेरा आलिंगन,
मेरे आगोश में सिमटी
जन्नत-ए-हूर।

मेरी पसंद
तुम नहीं समझ पाओगी।

तेरे होने, मेरे न होने के बीच
कुछ और भी हो
ये दोनों भी नहीं चाहते।

सच कह रहा हूँ…
ना,
मेरी जाँ।

फ़लसफ़ों से कोई वास्ता न हुआ,
मेरी तक़दीर
कुछ और ही है
तेरे अलावा,
तेरे बिना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *