
संध्या यादव, मुंबई
जब ज़रूरतें
सिर पर गिद्ध-सी मंडराती हैं,
नब्ज़ धीमी पड़ जाती है,
तालू से चिपकी लार सूखने लगती है…
बच्चों की चीख,
माँ की दवा,
बाप की टूटी ऐनक,
और बिस्तर पर एड़ियाँ रगड़ती
बीमार ज़िंदगी
मौत से रहम की भीख माँगती है…
जब हालात
कमर के नाड़े की गाँठ
धीरे-धीरे ढीली करते हुए
रोटी, कपड़ा और मकान के
सब्ज़बाग दिखाते हैं,
तब आँखों का पानी मर जाता है…
ज़रूरतें तांडव करती हैं
बारूद के धुएँ में,
धर्म की अंधी गलियों में,
असंवेदनशीलता की बौखलाई धूप में…
फूल जैसे बच्चे
आवारगी की कंकरीली सड़कों की ओर
मुड़ने लगते हैं…
और जब एक औरत
खुद उतार देती है अपने कपड़े,
तब सिर्फ़ उसका जिस्म नहीं,
बच्चों की उँगलियों में फँसी सिगरेट,
जवान जिस्म की सर्द हरारत,
बूढ़ी आँखों में पलती नंगी चाह,
और साथ ही
समाज,
रिवाज़,
धर्म,
रवायत,
ख़ानदान और शानो-शौकत
सब नंगे हो जाते हैं…

धन्यवाद सर
संध्या जी की लाजवाब कविता…मंटो,सच आज भी वही है दोस्त,समाज की नंगी सच्चाई को उभारती रचना
आपके अल्फाज़ गहरे असर छोड़ते हैं
कड़वी सच्चाई .. दिल को छूती हुई रचना 👌👌👌