
विजयलक्ष्मी सिंह
नील गगन में उड़ने की आशा,
कुछ कर गुजरने की अभिलाषा,
पंख तो अति शीघ्र ही कट गए,
कर्तव्यों के आगे उड़ने को मजबूर हुए।
तुमसे बताने को कुछ नहीं बचा,
तुम न थे मेरे पंखों को ऊँची उड़ान देने को।
मेरे रहबर, मेरे रहनुमा, तुम-सा कोई नहीं,
तुम्हारे दूर जाने से मेरे पास कुछ न बचा।
तुम्हारी यादों की कसक थी दिल में,
मेरे मन-मस्तिष्क को बेधती रही,
न सो सकी, कुछ बुनती उड़ानों में,
सूर्य की किरणों-सी उड़ानों की आशा लिए।
तुम्हें पसंद था कि मैं बेख़ौफ़ उड़ूँ, पर
वक़्त न मिला, पथरीली डगर थी कठिन,
एक वायु सैनिक बनूँ, देश की सेवा करूँ,
जान सकूँ ऊँची उड़ानों की परिभाषा।
अभी-अभी तो आशा के पंख लगे थे,
एक झटके से धड़ाम से गिरे हम,
अवनि भीग गई आँसुओं से मेरे,
तुम न थे, पर ऊँची उड़ानों की आशा में।
मैं बदहवास-सी हुई, पर उड़ने की आशा
उठी और चल पड़ी कठिन संघर्षों की डगर,
सकारात्मकता से परमात्मा के चरण गहे,
डगमगाती नौका हौले-हौले चल पड़ी।

हृदय स्पर्शी कविता