
–मधु गुप्ता, बाबूपाड़ा, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
यादों से भुलाया न जा सका,
असमर्थ मेरा मन रोके न रुका,
बहुत प्यारी शाम थी,
जब लिखी थी मैंने चिट्ठी उनके नाम की।
न जाने कैसे शब्द थे मेरे,
जो न निकले थे सवेरे,
शाम को ही मन में बहार आई थी,
फिर लिखी थी मैंने चिट्ठी उनके नाम की।
पक्षियों से बातें कर, हरियाली निहार रही थी,
कलम को पृष्ठ पर रखकर यादों को संवार रही थी,
अनोखा पल था वो मेरा, जब लिखी थी मैंने चिट्ठी उनके नाम की…।
अब चिट्ठी में बसी मेरी वो याद है,
बातें वो हैं, जो मैंने की उनके साथ हैं,
पढ़ूं मैं अपने शब्द तो अधर मुस्कुराते,
बड़ी रंगीन हैं यादें वो, जिनसे लिखी मैंने चिट्ठी उनके नाम की…।

हमेशा की तरह आपकी कविता बहुत ही सुंदर है 💕💕
Shandar rachna ❣️