मुंबई की महत्वाकांक्षी अंडरग्राउंड मेट्रो एक्वा लाइन3 को शुरू हुए तीन महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब भी यात्री एक बुनियादी सुविधा से वंचित हैंमोबाइल नेटवर्क. वर्ली से कोलाबा के बीच कई स्टेशन और सुरंगें ऐसी हैं, जहाँ ट्रेन तो निर्बाध दौड़ती है, लेकिन मोबाइल पूरी तरह नो नेटवर्क हो जाता है.
यह समस्या तकनीकी से ज़्यादा नीतिगत और व्यावसायिक टकराव का नतीजा बन गई है, जिसका खामियाजा रोज़ाना हजारों यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है.
सुरक्षा और आपातकाल की चिंता
यात्रियों का कहना है कि कई बार एक घंटे तक कॉल या इंटरनेट पूरी तरह बंद रहता है. आपात स्थिति में न कॉल लग पाता है, न संदेश भेजा जा सकता है. अंडरग्राउंड मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहन में यह स्थिति यात्री सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है.
कनेक्टिविटी नहीं, कमाई बन गई मुद्दा
फिलहाल मेट्रो लाइन-3 पर केवल और की सीमित कनेक्टिविटी उपलब्ध है. और उपयोगकर्ताओं को पूरे रूट पर नेटवर्क ब्लैकआउट का सामना करना पड़ रहा है. यहां तक कि नेटवर्क भी वर्ली से कफ परेड के बीच कई जगह कमजोर या गायब हो जाता है.असल विवाद मोबाइल इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत को लेकर है. मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने अंडरग्राउंड नेटवर्क के लिए इंडिया नाम की निजी कंपनी को ठेका दिया है. इसी कंपनी के नेटवर्क का उपयोग करने के लिए टेलीकॉम कंपनियों से शुल्क मांगा जा रहा है. टेलीकॉम कंपनियों का दावा है कि ने जिस इंफ्रास्ट्रक्चर पर 118 करोड़ रुपये खर्च करने की बात कही है, उसकी वास्तविक लागत लगभग 30 करोड़ रुपये ही है. पहले प्रति स्टेशन 13 लाख रुपये मांगे गए, जिन्हें घटाकर 5.5 लाख रुपये किया गया. इसके बावजूद टेलीकॉम कंपनियां इसे व्यावसायिक रूप से अव्यवहारिक बता रही हैं.टेलीकॉम कंपनियों ने खुद का नेटवर्क लगाने की अनुमति मांगी है, लेकिन ने मंजूरी नहीं दी. टेलीकॉम ऑपरेटर इसे टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 का उल्लंघन बता रहे हैं, जो सार्वजनिक प्राधिकरणों को देने से मना नहीं करने देता. वहीं का कहना है कि के साथ किया गया समझौता नए कानून से पहले का है और नियमों की व्याख्या अभी स्पष्ट नहीं है.
विवाद को और गहरा बना रही है कम यात्री संख्या. टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि जब लाइन पर अभी भी सीमित यात्री हैं, तब इतना अधिक शुल्क देना तर्कसंगत नहीं. वहीं मेट्रो प्रशासन गैर-किराया आय को भविष्य की स्थिरता के लिए जरूरी मानता है.
सबसे ज्यादा नुकसान यात्रियों को
विशेषज्ञों का मानना है कि यह लड़ाई न तो केवल मुनाफे की होनी चाहिए और न ही अनुबंध की. मोबाइल कनेक्टिविटी एक बुनियादी सार्वजनिक सेवा है, खासकर अंडरग्राउंड परिवहन में. सुझाव दिया जा रहा है कि यात्री संख्या के साथ लचीली और चरणबद्ध फीस व्यवस्था लागू की जाए, ताकि जल्द से जल्द यात्रियों को नेटवर्क सुविधा मिल सके. फिलहाल, मुंबई की यह आधुनिक मेट्रो लाइन तकनीकी रूप से भले ही आगे हो, लेकिन डिजिटल कनेक्टिविटी के मामले में अब भी अंधेरे सुरंग से बाहर आने का इंतज़ार कर रही है.
जमीन के नीचे दौड़ रही ट्रेन, लेकिन ‘डिजिटल अंधेरे’ में
