52 साल के बाद हुआ सपना पूरा

विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
हम बचपन से पढ़ते आए हैं …धरती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो यहीं है… यहीं है… यहीं है…. अमीर खुसरो ने कश्मीर को बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है. थोड़े बड़े हुए तो और एक गीत सुना… कितनी खूबसूरत यह तस्वीर है… हां यह कश्मीर है. कश्मीर का नाम सुनते ही एक खूबसूरत तस्वीर नजरों के सामने आ जाती है जो हमने अक्सर फोटोस या फिल्मों में देखी है. बर्फ से ढकी चोटियां, खूबसूरत कॉटेज और पानी पर बहते हुए शिकारे यह तमाम खासियत कश्मीर को धरती का स्वर्ग बनाती है. हर किसी का ख्वाब होता है कि कश्मीर की हसीन वादियों में जाकर देखें तो सही कि उसमें ऐसा क्या है जो उसे धरती का स्वर्ग कहा जाता है. मेरा भी सपना था कि मैं कभी कश्मीर जाऊं और मेरा यह सपना 52 साल बाद पूरा हुआ जब 2 अक्टूबर 2023 में हम कश्मीर गए. तो चलिए मेरे साथ-साथ आपको भी मेरे सपनों की हसीन वादियों में ले चलती हूँ जहाँ कहीं झेलम, कहीं सिंधु तो कहीं चिनाब कल-कल बहती हुई मधुर संगीत सुनाती है. जिसके साफ और चमकते पानी में हमें चिनार और चीड़ के पेड़ों की परछाइयां बहुत साफ नजर आती है. बड़ा सुंदर नजारा होता है.

सफर की शुरुआत -घर से श्रीनगर तक
1 अक्टूबर रात 3:00 बजे यानी 2 अक्टूबर की सुबह हम घर से एयरपोर्ट के लिए निकले. सुबह 5:15 बजे जब विमान ने उड़ान भरी तब दिन भर की थकान नींद बनकर हावी हो गई और आँखों ने बंद होकर सपने देखने शुरू कर दिए. 2 अक्टूबर 7:15 बजे हम इंदौर पहुँचे जहाँ से 10:00 बजे हमारी जम्मू की फ्लाइट थी. जम्मू पहुँच कर 1:00 बजे के करीब हम श्रीनगर के लिए निकले, जहाँ रास्ते में हमें बहुत सारी सुरंगे मिली, जिसमें से एक 9 किलोमीटर लंबी थी. उस रास्ते में काम शुरू होने की वजह से हमें श्रीनगर पहुँचने में काफी वक्त लग गया. रास्ते में हमने बरिस्ता की पुरानी पंजाबी हवेली में खाना खाया जो बहुत लजीज था. उस होटल की सजावट में रखी गई पुरानी पारंपरिक चीजों ने हमें बीते जमाने की याद दिला दीमटके, हांड़ी, टाइपराइटर और आले. रात में 10:30 बजे हम श्रीनगर पहुँचे, जहाँ होटल में शेफ हमारी खातिरदारी के लिए हमारा इंतजार कर रहे थे. खाना खाने के बाद नींद और थकान ने मिलकर हमें जल्दी सोने पर मजबूर कर दिया.

सोनमर्गः बर्फ, सिंधु और सैनिकों का साहस
दूसरे दिन सुबह उठे तो खुद को बहुत फ्रेश महसूस किया. 10:30 बजे तक हम सोनमर्ग के लिए रवाना हुए. खुला आसमान, चारों तरफ चट्टान वाले पहाड़ और लाइन से सटे चिनार के पेड़. नीचे कल-कल बहती सिंधु नदी. एक पॉइंट पर बहती नदी के साथ उसकी लहरों से बात करने हम भी उतर पड़े और फोटो के माध्यम से वो मंजर दिल और कैमरे में कैद कर लिया. सोनमर्ग पहुँचने से पहले रास्ते में जवानों की गाड़ियों की कतारें दिखीं. हम सोच रहे थे ठंड से बचने के लिए हमने कितना कुछ पहन रखा है, जबकि हमारे जवान हमें बचाने के लिए हौसले का स्वेटर पहनकर डटे रहते हैं. सोनमर्ग पहुँचते-पहुँचते बर्फ से ढके पहाड़ नजर आने लगे, जिन पर सूरज की किरणें पड़ते ही सुनहरी आभा बिखर जाती थी. वहाँ पहुँचते ही स्नोफॉल शुरू हो गया. ठंड बढ़ गई, पर यही तो चाहिए था. खूब एंजॉय किया और फिर शाम तक श्रीनगर लौट आए. रात में दोस्तों के साथ तंबोला (हाउजी) गेम का खूब मजा लिया.

श्रीनगरः शालीमार, निशात और डल लेक
4 अक्टूबर की सुबह बहुत खुशनुमा लगी. नाश्ते के बाद हम शालीमार गार्डन गए. हरियाली भले सीमित थी, पर उसका इतिहास बेहद रोमांचक था. गाइड ने चिनार के पेड़ों की खासियत बताईपतझड़ में भी लाल पत्तियों के कारण सबको आकर्षित करते हैं. चिनार यानी खूबसूरत. लाल, पीली और हरीतीन रंगों में दिखती पत्तियाँ. फिल्म मोहब्बत की गिरती पत्तियाँ याद आ गईं. इसके बाद हम निशात गार्डन पहुँचे, जहाँ चटक फूलों और पहाड़ियों के बीच की हरियाली ने मन मोह लिया. कश्मीर की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर खूब मजे किए. लोकगीत ङ्गभूमरो भूमरोफ पर कदम खुद-ब-खुद थिरक उठे. फिर श्रीनगर मार्केट गएजहाँ शॉपिंग तो होनी ही थी. शाम को डल लेक में शिकारे की सैर की. शिकारे में बैठकर गाना-बजाना, खाना और शॉपिंगसब कुछ अनोखा अनुभव था. थकान के कारण रात को जल्दी लौट आए.

गुलमर्ग ःचीड़, घोड़े और दोस्ती की गर्माहट
5 अक्टूबर की सुबह होटल में कहवा पीकर हमने श्रीनगर को अलविदा कहा और गुलमर्ग के लिए निकल पड़े. दोस्तों की संगत और श्रीनगर की यादों ने माहौल रोमांटिक बना दिया. बस में पुराने गाने गाते हुए सफर मजेदार हो गया. रास्ते में पशमीना शॉल के कारखाने में रुके. बुजुर्ग कारीगरों को कम रोशनी में बिना चश्मे के कशीदाकारी करते देखा. पशमीना ऊन को कंघी से अलग करने की जानकारी ने हैरान किया. दोपहर में गुलमर्ग पहुँचे. चीड़ के पेड़ों की घनी कतारें मन मोह लेती हैं. इन पेड़ों पर पतझड़ नहीं आताये पूरा सूख जाते हैं. घोड़े पर बैठकर राजा हरि सिंह का महल और स्ट्रॉबेरी वैली देखी. शाम को होटल लौट आए और देर रात तक काव्य-संग्रह भीगे अल्फाज के साथ दोस्ती के रंग बिखरते रहे.

गंडोला ः ऊँचाइयाँ और जीवन का दर्शन
गुलमर्ग की अगली सुबह शंकर जी के मंदिर से हुई. पास ही पशमीना सीरियल की शूटिंग चल रही थी. गंडोला से 11,506 फीट की ऊँचाई तक पहुँचे, जहाँ सनशाइन, नंदा देवी और हरीमुख पीक नजर आए. आगे झरने तक पैदल जाना पड़ा. रास्ता कठिन था. एक पल फिसली, पर घोड़े वाले ने संभाल लिया. उतरते समय डर था, पर सही संतुलन से रास्ता पार हुआ. मन में विचार आयाजिंदगी की यात्रा भी ऐसी ही है, लगाम सही हो तो उतार-चढ़ाव पार हो जाते हैं.

पहलगामः जंगलों की गोद में
7 अक्टूबर की सुबह वापसी की तैयारी हुई, पर अचानक फैसला बदला और हम पहलगाम निकल पड़े. रास्ते में प्राचीन सूर्य मंदिर देखा. केसर और कहवा खरीदा. केसर की असली पहचान जानी. एप्पल वैली में ताजे सेब का जूस पीया. शाम तक पहलगाम के गेस्ट हाउस पहुँचेघने जंगल, चीड़ और अखरोट के पेड़, चारों ओर सन्नाटा. लकड़ी के गेस्ट हाउस ने ठंड के बीच गर्माहट दी.

अरू वैली, चंदनवाड़ी और बेताब वैलीः विदाई के एहसास
8 अक्टूबर को अरू वैली, चंदनवाड़ी और बेताब वैली घूमे. झरनों की कल-कल, स्लेटी चट्टानें और भेड़ों के झुंडसब मन में उतरता चला गया. शाम को जंगल में खेलते बच्चों को देखा. कश्मीर की आखिरी रात भारी मन से गुजरी. अगली सुबह जब श्रीनगर के लिए निकले, तो दिल ने कहाइन हसीन वादियों से दो-चार नजारे चुरा लें तो चलें.

स्वर्ग का असली अर्थ तो कश्मीर हैं,आपने अपनी यात्रा वृत्तान्त की मनमोहक झलकियां शब्दों को पुरुस्कृत की है।।अब तो हमें भी घूमने जाने का मन कर रहा है।।कश्मीर तुम मुझे भी बुला लो।।।