उस दोपहर..

रेलवे पटरी के पास खड़ी एक महिला, जो दूर खेतों की ओर देख रही है अकेलेपन और आज़ादी की चाह का प्रतीक “कभी-कभी सबसे बड़ी दूरी बस एक पटरी की होती है… और उसे पार करना ही सबसे मुश्किल”

सृष्टि उपाध्याय,सुप्रसिद्ध साहित्यकार
पता : फ्लैट नं 305, मालव कुंज, ए ब्लाक, संवाद नगर इंदौर ( म.प्र.) 452001 

दूर तक अजगर की तरह फैली सड़क पर सारे दिन कारों और मोटरसाइकिलों का रेला बहता रहता है। इस बहाव को देखकर लगता है कि यह छोटा-सा कस्बा कब सोता है और कब जागता है कौन जाने।

राबर्ट्सगंज का वह इलाका, जहाँ निवेदिता रहती है, उसके घर से चार फर्लांग की दूरी पर रेल की पटरियाँ बिछी हैं। यह एक तीन मंज़िला मकान है। मकान के पीछे मीलों तक फैले खेत और तरह-तरह के पेड़ गहराती रात में अजीब-सी सरसराहट पैदा करते हैं।

निवेदिता की शादी को अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए बस छह महीने ही तो हुए हैं इस घर में आए। वह अब तक रेल की पटरी पार करके सड़क के उस पार नहीं गई। दिन में सड़क की रफ़्तार और बीच में पटरियों की काली रेखा उसे आगे बढ़ने से रोक देती है।

जब भी उसे फुर्सत मिलती, वह अपने घर की तीसरी मंज़िल से सड़क को निहारा करती। बारिश के दिनों में धुंधलाते सूरज वाला यह कस्बा कई मायनों में अलग लगता। चारों ओर मिट्टी की सोंधी खुशबू मन में अजीब तरंगें उठाती, पर उन तरंगों को समझने वाला यहाँ कोई नहीं था।
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भीगते बच्चे, बसों और रिक्शों की आपाधापी सब कुछ कितना सुहावना, कितना मोहक लगता। इन्हें देखते-देखते उसकी आँखें नम हो जातीं और उसे अपने घर की याद आने लगती।

उसके पापा डॉक्टर थे। दो बहनों की शादी के बाद उसकी शादी बड़े चाव से की गई। लड़का मिर्ज़ापुर की एक सीमेंट फैक्ट्री में मैनेजर था। राबर्ट्सगंज में उसका तीन मंज़िला मकान, पीछे फैले खेत सब कुछ देखकर पापा बहुत खुश थे। एक शुभ मुहूर्त में वह रोहित की दुल्हन बन गई।

इलाहाबाद जैसे शहर में पली-बढ़ी निवेदिता के लिए यह जगह न पूरी तरह शहर थी, न गाँव। पर वह विरोध का समय नहीं था, इसलिए उसने चुपचाप सब स्वीकार कर लिया।

घर बाहरी इलाके में था, आसपास कुछ ही घर। रोहित हफ्ते के अंत में आता और सोमवार सुबह चला जाता। पहली मुलाकात में ही उसने साफ कह दिया था कि उसे यहीं रहना होगा वह अपने माता-पिता को अकेला नहीं छोड़ सकता।

रोहित के जाते ही जैसे ज़िंदगी भी खामोश हो जाती। उसके जीवन में आवाज़ों के पुल बनाती थीं—रेल की सीटी और स्कूल जाते बच्चों की चहल-पहल।

दिन ढलते-ढलते उसके भीतर अजीब बेचैनी भर जाती। वह चाहती कि एक दिन पटरी पार करे, बारिश में भीगे, बच्चों के साथ दौड़े। हर सुबह सोचती आज ज़रूर जाऊँगी, पर शाम तक खुद पर हँसी आने लगती।

रात में अक्सर वह सपना देखती वह पटरी के उस पार भाग रही है, कहीं दूर…

एक दिन, सर्द सुबह, उसने घर का काम जल्दी निपटाया और पीछे के दरवाज़े से खेतों की ओर निकल पड़ी। पगडंडी, गीली मिट्टी और पेड़ों की छाँव से गुजरते हुए वह खेत के बीच पहुँच गई।

उसे लगा जैसे उसकी दुनिया बदल गई हो।

अनाज की बालियाँ हवा में लहराकर जैसे आकाश को छू रही थीं। आम और कटहल के पेड़ों के सहारे फैली बेलें मानो झंडे-सी लहरा रही थीं। पास ही मिट्टी का चूल्हा ताज़ा लीपा हुआ था और वातावरण में मिट्टी की महक घुली थी।

थोड़ी दूर एक कुआँ था, जहाँ दो बैल पहिया घुमा रहे थे और पानी नाली से खेतों में बह रहा था। निवेदिता ठिठककर उन्हें देखने लगी।

तभी उसने देखा आँवले के पेड़ के नीचे एक किशोर लड़का लेटा सीटी बजा रहा है। उसे देखकर वह चौंककर उठ खड़ा हुआ।

“तुम कौन हो?” निवेदिता ने पूछा।

“मैं खेत की रखवाली करता हूँ… बैल और पक्षी सब मेरे दोस्त हैं,” उसने गर्व से कहा।

“तो मुझसे भी दोस्ती करोगे?” निवेदिता के मुँह से अनायास निकला।

लड़का चुप रह गया। फिर कुएँ के पास जाकर बैलों को हाँकने लगा और सीटी में धुन छेड़ दी। बैलों के घुँघरुओं की आवाज़ उस धुन में मिलकर एक अनोखा संगीत रचने लगी।

निवेदिता को लगा—जैसे उसकी रुकी हुई ज़िंदगी में कोई मधुर तार छेड़ गया हो।

जब वह लौटने लगी, तो लड़का दौड़कर कुछ कच्चे-पके फल लेकर आया
“आप रोज़ आया करो… मैं रोज़ आपके लिए फल रखूँगा।”

यह सुनकर वह ठिठक गई। क्या वह रोज़ आ पाएगी?

फल लेकर वह तेज़ कदमों से घर की ओर लौट चली।

पीछे बैल अब भी उसी घेरे में घूम रहे थे। अचानक उसे लगा उसकी ज़िंदगी भी इन्हीं बैलों जैसी है।

बैल के घेरे में कुआँ है, और उसके घेरे में रोहित।
बैल चाहे जितना घूमे, कुआँ वहीं रहता है।

क्या उसकी ज़िंदगी भी ऐसे ही एक घेरे में बंधी है?

कुएँ से बहता पानी मिट्टी को और गीला कर रहा था, और वह सोच में डूब गई
पत्थरों से निकलते पानी को धरती पी रही है… या खेत?

कौन जाने…

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    – सुरेश परिहार

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