gulmohar

चिड़िया

रात में कमरे के भीतर उड़ती रहस्यमयी चिड़िया बंद कमरे में रात के सन्नाटे के बीच दिखाई दी एक रहस्यमयी चिड़िया, जिसकी पहेली आज भी अनसुलझी है.

किश्वर अंजुम की पुस्तक परछाइयां अंधरों की से एक लंबी कहानी का तीसरा एवं अंतिम भाग

kishwar anjum

किश्वर अंजुम, भिलाई

बावर्चीखाने में सुबह की रोटियाँ रखी थीं। रात के खाने में उन्हीं को अचार के साथ खा लिया और सोने की तैयारी करने लगी।

औरत के एक दिल में न जाने कितने दिल छुपे रहते हैं। कभी मोहब्बत भरा, कभी हसद भरा, कभी दिल जल्लाद, कभी नफ़रत भरा, लेकिन इन सारे दिलों के बीच जो दिल सबसे तेज़ धड़कता है, वो ममता का होता है।

वो ममता, जो औरत के वजूद का ख़मीर ही होती है, हालांकि कभी-कभी हसद और नफ़रत के जरासीम उस पर हावी हो जाते हैं।

कल वो आ जाएँगे तो पूछूँगी कि क्या हम उस बिन माँ के बच्चे की परवरिश कर सकते हैं? बस, उतने ही दिनों तक, जब तक वो थोड़ा-सा बड़ा हो जाए।

वो बावर्चीखाने से लालटेन लेकर कमरे में आ गई। दरवाज़ा बंद किया। मिट्टी के तेल (केरोसिन ऑयल) पर राशनिंग थी। बचत से इस्तेमाल करना होता था, लेकिन जब अकेली रहे तो वो सारी रात लालटेन जलने देती थी, हालांकि बत्ती धीमी कर देती थी।

वो बिस्तर पर लेट गई। रात की बढ़ती गहराई के साथ ठंड भी बढ़ रही थी। आरामदायक गर्म दुलई अम्मा की दी हुई थी और उसमें दुबककर उसे अम्मा की गोद में होने का अहसास होता था। लालटेन की हल्की-सी रोशनी ने कमरे के ठंडे माहौल को अजीब-से हिसार में ले लिया था। आज न जाने क्यों उसका दिल घबरा रहा था।

उसने आँखें बंद कर लीं और सोने की कोशिश करने लगी।

एक साया-सा उसकी आँखों के आगे से गुज़रा, छोटा-सा।

हाय, ये क्या? उसने आँख खोलकर देखा और वैसे ही वो साया उसके पैताने से सिरहाने की तरफ़ आया और फ़ौरन ही सिरहाने से फिर पैताने की तरफ़ गया और बहुत तेज़ी से ये हलचल होने लगी।

वो एक चिड़िया थी, उसी चिड़िया के जैसी, जो आज उसने बच्चे के पालने के पास देखी थी। वो उसके सिरहाने से पैताने उड़ रही थी।

कैसे?

घर के दरवाज़े-खिड़कियाँ हमेशा बंद रहते हैं। जब शौहर घर में नहीं होते, तब तो वो और भी सतर्क रहती है कि कहीं खिड़की-दरवाज़ा खुला न रह जाए।

दोपहर को जब वो बाहर गई, तब सारे दरवाज़े-खिड़की बंद ही थे। रोशनदान ज़रूर था, पर उसकी बारीक जाली से छिपकली नहीं आ सकती थी, तो चिड़िया कैसे आती?

दिल से न मानते हुए भी वो बात, उसके कानों में गूँजने लगी,

“वो चिड़िया उसकी माँ ही है।”
“वो चिड़िया उसकी माँ ही है।”

उसके कानों में सनसनाहट होने लगी।

चिड़िया उसे अपने पंखों के बीच दबाकर उड़ाए लिए जा रही थी और उस बिन माँ के बच्चे के पालने के पास लाकर छोड़ दिया, जिसे गोद में लेकर वो आज बैठी थी। बिन्नो की मरी माँ वहाँ खड़ी थी। उसने पालने की तरफ़ इशारा करके कहा, “क़ैसर! इसे उठा लो!”

उसने पालने की तरफ़ हाथ बढ़ाया ही था कि उसे लगा कोई उसका नाम ले रहा है, बहुत दूर से,

“क़ैसर, क़ैसर।”

धाड़-धाड़-धाड़, एक आवाज़, नगाड़े जैसी, उसके कानों में गूँज रही थी।

सुबह हो गई थी। उसके शौहर वापस घर आ गए थे। वो बेहोशी में थी और इन आवाज़ों से उसे होश आया।

धीरे से उसने आँख खोली। रोशनदान की बारीक जाली से सूरज की रोशनी छन-छनकर उसके चेहरे पर गिर रही थी।

रात को कमरे में उड़ने वाली चिड़िया का नामोनिशान नहीं था। खिड़की बंद थी, दरवाज़ा बंद था, रोशनदान से आना मुमकिन नहीं था।

पलंग के नीचे, अलमारी के ऊपर, चिड़िया कहीं नहीं थी।

उसका ज़हन अभी भी उलझा हुआ था।

किसी तरह उसने बाहर का दरवाज़ा खोला। शौहर को आया देख उसकी जान में जान आई।

चिड़िया पूरे घर में कहीं नहीं थी। जब उसने बाहर का दरवाज़ा खोला, तब भी वो उड़कर बाहर जाती नज़र नहीं आई।

न जाने वो कौन थी, चिड़िया या कुछ और!

या शायद, उसका, बिन माँ के बच्चे के प्रति मोह देखकर आई उसकी माँ, जो शायद सिफ़ारिश कर रही हो कि मेरे बच्चे को संभाल लो।

कभी-कभी कुछ पहेलियाँ अनसुलझी ही रहती हैं।

ये भी उन्हीं में से एक रह गई।

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