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विडंबना

चूड़ियों वाले हाथ में कलम लिए लिखती भारतीय महिला लेखिका चूड़ियों की खनक से आगे बढ़कर कलम उठाती स्त्री अपने अनुभवों और चुप्पियों को शब्द देती है.

संतोषीदेवी

हम जो स्त्रियाँ लिखती हैं,
उनकी नज़र में
यह सत्ता के ख़िलाफ़ है,
क्योंकि
हमें सिखाया गया था
बेल-बूटे बनाना,
रंगोली सजाना,
ख़ुद को सजाना-सँवारना।

लेकिन हमने
चुपके से कलम उठाई
उस हाथ से,
जो
चूड़ियों की खनक तक सीमित था।

और उकेरते ही
आ गईं
बिगड़ैलों की कतार में।

पता है तुम्हें,
काग़ज़ पर
फूल नहीं उगाए थे हमने,
लिख दी थी
जड़ों की आग,
देह की थकान
और चुप्पियों का विद्रोह।

5 thoughts on “विडंबना”

  1. बहुत सुंदर स्त्रीत्व को समर्पित रचना। लाजवाब

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