कल, और आज़

कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।

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