जाग रे इंसान

गुरु मनुष्य को समझाते हैं कि हे इंसान, अब सो मत, जाग जा। तेरे जीवन का अधिकांश समय काम और जिम्मेदारियों में बीतता है, परंतु यदि तू तेईस घंटे कर्म करता है तो एक घंटा प्रभु के ध्यान के लिए अवश्य निकाल। यही तेरे जीवन का सच्चा संतुलन है।

मनुष्य का यह शरीर नौ द्वारों से बना है, जिनसे वह सांसारिक कार्य करता है। परंतु जब वह शब्द-ध्वनि के माध्यम से दसवें द्वार से जुड़ता है, तब उसे भगवान का साक्षात्कार होता है। यही शाश्वत सत्य है।शब्द ही वह शक्ति है जिसने धरती और आकाश को थाम रखा है। सृष्टि की जननी शब्द है, और शब्द ही प्रकाश देता है। जो इस सत्य को पहचान लेता है, वही ईश्वर की निकटता को प्राप्त करता है।
जो मनुष्य तन और मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता, वह कालचक्र में फँसा रहता है। ऐसा व्यक्ति जीवन भर संघर्ष करता है और अंततः उसे सबकुछ त्यागकर जाना पड़ता है।

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क्यूँ जिंदा है…

“क्यूँ ज़िंदा है ज़िंदगी जब ये सवाल करे,
उत्तर अपने सारे बस बवाल करे,
मीठे बोले लगते हो खारे,
ख्वाब सारे रह जाए अधूरे,
जो आंखों में आंसू भर भर आये —
उफ्फ! अब ना तो जिया जाए,
तब मन की गिरह खोल के सारी,
सिर्फ़ रब को याद करना।”

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