खुशी खुशी कर दो विदा…
आज जब उसकी विदाई का समय आया , तो कैसे समझाऊं अपने मन को…. उसके बिना… जीने की आदत जो नहीं है….
दुनिया की रस्म है…. निभानी तो पड़ेगी ।

आज जब उसकी विदाई का समय आया , तो कैसे समझाऊं अपने मन को…. उसके बिना… जीने की आदत जो नहीं है….
दुनिया की रस्म है…. निभानी तो पड़ेगी ।
“वह छोटी सी बच्ची बिना कुछ कहे मुझे व्यवस्थित रहना सिखा रही थी।कभी माँ जैसी समझाती, कभी दोस्त सी हँसी बिखेरती, और कभी बेटी सी बाँहों में समा जाती। शायद नन्ही मेरे जीवन में भगवान की भेजी हुई वो रोशनी थी,जिसने मेरी तन्हाई को घर बना दिया।”