कल, और आज़

कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।

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तेरी यादों का सैलाब

तेरी यादें जब भी उठती हैं तो सैलाब-सी बनकर मन को बहा ले जाती हैं। आँखों से आँसुओं के कतरे ढलते हैं, और हर कण में तेरा ही नूर झलकता है। तू अपनी जुल्फ़ों से बहारों को महकाती है, इंद्रधनुष-सी रंगीन चूनर लहराती है और चांदनी रातों को मधुशाला बना देती है। जितना तुझे भूलने की कोशिश करता हूँ, उतनी ही गहराई से तू याद आती है।

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उम्मीद की किरण

सब कुछ बदलता है, और जब समय रोगग्रस्त हो जाता है, तो समाज भी अपने अंदर रोग छुपाए रहता है। दिलों में प्यार की कमी और भेदभाव का विष फैलता है, शांति पर चोट पहुँचती है और अशांति का बोलबाला होता है। भूख और पीड़ा में घिरी मासूम बच्ची इसका प्रतीक है—सूखे स्तन और अमुक्त शरीर से उसकी प्यास कैसे बुझेगी? ना ऊपर कोई छत है, ना कोई आवरण। यह समय रोगग्रस्त है, हवा भी विचलित है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण जलती रहती है।

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नारी

नारी केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि जीवन का उद्घोष है। नारी कई रूपों में विघटित है, गणना से परे, क्योंकि इसके रूप तो अगणित हैं। आज नारी अबला नहीं, बल्कि सबला बनकर अपने अधिकार और सम्मान के परचम लहरा रही है।

पुरुष प्रधान जगत में नारी अब पुरुष से कम नहीं है। नारी पृथ्वी की शक्ति है; बिना नारी के जगत शक्ति विहीन है। संपूर्ण सृष्टि में नारी के बिना सब कुछ ही अधूरा और स्तरहीन है। नारी केवल कामिनी नहीं, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय है। नारी केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि कभी-कभी मृत्यु भी बन जाती है।

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 औरत…

औरत अपने भीतर अनगिनत भावों और संवेदनाओं को समेटती है। उसकी आँखों में उफनते समंदर को वह बाँध देती है, और दिल में उमड़ने वाले सैलाब को रोक लेती है। उसके ज़ेहन में कई विचार घूमते हैं, नस-नस में खामोशी दौड़ती है, और कश्मकश में उसकी रातें बेहिसाब बीतती हैं।

जीवन में आए पुरुष – पिता, भाई, पति या बेटा – उनके दुख, दर्द, बुराइयाँ, कहानियाँ और कई राज़ वह अपने सीने में दफ़्न कर लेती है। इतने सब कुछ होने के बावजूद, समाज अक्सर यह कहता है कि औरत के पेट में कोई बात नहीं छिपती। लेकिन सच यह है कि औरत अपने भीतर पूरा ब्रह्मांड समेटे हुए है।

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क्यों है?

राह में काँटों का मंजर बिखरा पड़ा है, फिर भी दिल फूलों की ओर आकृष्ट होता है। दामन भले ही बेवफाई की कहानियों से भरा हो, फिर भी वफ़ाओं पर भरोसा कायम रहता है। उसकी पल-पल रूठने की आदत है, लेकिन नाज़-नखरों को उठाने में वह पीछे नहीं हटता। आँधी और तूफ़ान उसे रोक नहीं पाएंगे, फिर भी यह बात दिल को गर्वित करती है। हरी-भरी वादियों पर उसने लाल रंग डाला, और इसके बावजूद उसे क्षमा किया जाता है। समुंदर की गहराई नापने की कला है उसमें, फिर भी गोता लगाने से डरता है। रोज़-रोज़ बदलता चेहरा देखकर आइना भी हैरान रह जाता है।

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मेरी यायावरी!

मेरी यायावरी ने मुझे एक अनवरत पथगामी बना दिया है, जैसे मैं इस धरा पर रहते हुए भी व्योम का वासी बन गया हूँ। मन को पल भर का चैन नहीं मिलता। स्मृतियों का इतिहास वह निरंतर रचता रहता है और क्षणभंगुर जीवन में नए-नए आकाश गढ़ता रहता है।

कभी यह मन वृक्ष की ऊँची फुनगी पर जा बैठता है, मधुर राग बनकर इतराता है। अगले ही पल जब तेज़ हवा का झोंका आता है तो तंद्रा भंग हो जाती है और यह यथार्थ की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ता है।

हर क्षण एक मृदुल तरंग उठती है। शब्दों के घाट पर नंगे पाँव घूमती भावनाएँ अकुलाई-सी मोती चुनती रहती हैं। उन्हीं मोतियों से स्वर्णिम अभिव्यक्तियाँ जन्म लेती हैं और तभी एक नया काव्य आकार पाता है

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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प्रेम शाप है….

यहाँ प्रेम को शाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो नाश और विरक्ति के साथ-साथ एक अमरता का भाव भी लिए है। शहरों का विकास प्रकृति को निगल गया, परंतु शापित खंडहर अब भी अछूते हैं—मानो प्रेम भी उसी तरह समय और विनाश से परे जीवित रहता है। सूखी नदियाँ, वीरान इमारतें और तप्त अधर—ये सभी स्मृतियों और अधूरेपन के प्रतीक हैं। वक्ता मानो किसी पूर्वजन्म की स्मृति से बंधा हुआ है, और प्रेम को “सांकेतिक मरीचिका” कहकर उसकी अस्थिरता और मृगतृष्णा-सी प्रकृति को सामने लाता है।

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कर्म की सीख…

सफलता आस्था को और प्रबल कर देती है . पंडित जी ने दोनों के जन्मांक देखें और पहले लड़के से कहा – कि वह इस बार अवश्य अधिकारी बन जाएगा और दूसरे लड़के से कहा- तुम्हारे ग्रह नक्षत्र कमजोर हैं, इसलिए तुम्हें किसी अन्य व्यवसाय पर ध्यान देना चाहिए.
१० वर्ष की आस्था भविष्य के आकलन को समझ नहीं पाती, परंतु वह दादा से कहती है कि मेरे विद्यालय में यह बताया जाता है, कि परिश्रम से भाग्य बनता है .आप सभी को परिश्रम से विमुख क्यों कर रहे हो?

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