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किसी की आहट… कोई तो है

रात की नीरवता में मन बार-बार किसी अज्ञात उपस्थिति को महसूस करता है. जैसे कोई अदृश्य कदमों से मन के आँगन तक आ पहुँचा हो। पहचान स्पष्ट नहीं, पर एहसास गहरा है। कोई है… जिसकी आहट, जिसकी परछाईं, जिसकी अनकही मौजूदगी दिल को बेचैन भी करती है और आकर्षित भी। मन बार-बार उसी ओर खिंचता है.

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पुनर्जन्म…

बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?

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