एहतियात कैसी ?

सपने सदियों से कल्पना के आसमान में उड़ान भरते आए हैं और हर बार यथार्थ की धरती पर लौटकर हमें यही सिखाते हैं. जब दिल सच्चा हो, तो एहतियात की कैसी गुंजाइश? एक मुट्ठी आसमान, शबनम का छोटा-सा कतरा इन छोटी-सी चीज़ों में भी प्रेम दरिया बनकर उमड़ आता है।

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बचपन

बचपन के वे सुनहरे दिन छोटी-छोटी खुशियों से भरे थे काग़ज़ की कश्तियाँ, बरसात की लहरें और मासूम शरारतें। पर समय बदल गया; तकनीक और प्रतिस्पर्धा ने सरल मनों पर बोझ डाल दिया। जहाँ बच्चों को खुलकर उड़ना चाहिए था, वहीं आज उनके आस-पास चिंता, दबाव और अनचाही समझदारी के पहरे खड़े हैं। फिर भी आशा यही है कि बचपन अपने स्वच्छंद पंखों से उड़ान भरे और माता-पिता का मार्गदर्शन उन्हें सही दिशा दे।

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