ग़ज़ल

प्यार से लबरेज़ दुनिया में कोई गर दिल न हो तब तो ये दुनिया भी शायद रहने के क़ाबिल न हो सूना सूना भूतिया सा मुझको लगता अपना घर जब तलक आँगन में कोई बच्चों की खिल खिल न हो बस चले जाना ही हर दिन आदमी का शग़्ल है कोई दिन उसका न होता…

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