आँखों की ख़ामोशी

इन आँखों की ख़ामोशी में एक दबी हुई रागिनी है अनकहे शब्दों की, आधी छूटी कहानियों की। चेहरे पर ठहरी शांति और निगाहों में उठते-गिरते समंदर के बीच एक गहरा मंथन छुपा है। ये आँखें जैसे हर सवाल का जवाब अपने भीतर समेटे बैठी हों, मानो कह रही हों कि उन्होंने बहुत कुछ देखा है… पर कहने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।

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जरा-ज़रा तू हमसे मिल

मन बार-बार उस प्रिय को पुकारता है—“जरा-सा मिलो, तनिक-सा मेरे दिल में उतर आओ।” आँखें जो कहती हैं, वही शब्दों से सुनना चाहता है। सपनों में बीती रातें और अंतस की अनकही बातें, सब उसी से जुड़ी हैं। उसका साथ वेदना हर लेता है, उसके अधरों की मुस्कान अमृत बरसाती है। यदि मिल न पाए तो हृदय तड़प-तड़प कर व्याकुल हो उठता है। अब तो चाह यही है कि वह बिना दस्तक इस जीवन में आ बसे, और परिणय के बंधन में सब कुछ स्थिर हो जाए। उसकी आँखों की गहराई में डूब जाना मानो किसी झील में समा जाना है।

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