भाषा
कविताएँ हर भाषा को अपने भीतर जगह देती हैं। वे जानती हैं कि भाषा कोई बंधन नहीं, बल्कि संस्कृति और चेतना के बीज हैं। चरवाहे का गीत, मछुआरों की धुन और मजदूर का प्रतिरोध—सबकी आवाज़ कविताएँ सीमाओं से परे ले जाना चाहती हैं। भाषाओं का मेल ही विचारों को स्थायी बनाएगा और मानवता को जीवित रखेगा।
