शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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