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तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

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माँ जैसी नहीं हूं मैं…

यह कविता एक आत्मस्वीकृति है — एक बेटी की अपनी माँ के प्रति संवेदनाओं, निरीक्षणों और अनुभवों की गहराई से उपजी भावनाओं की अभिव्यक्ति। वह कहती है कि वह अपनी माँ की खामोशी पढ़ लिया करती थी, माँ के संघर्षों और त्याग की साक्षी रही है। माँ की आँखों में छिपे दर्द, जीवन की कठोर सच्चाइयों से संघर्ष, और अपनी इच्छाओं को निस्वार्थ भाव से दबा देने का दृश्य उसने बार-बार देखा।

वह माँ की हर वह चुप्पी पहचानती थी, जिसे दुनिया अनदेखा कर देती है। माँ के आँचल से आँसू पोछने से लेकर, चाँदनी रातों में अपने दुखों से बात करने तक की हर एक लम्हा, बेटी के मन में गहरे बैठ गया।

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मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूरी, अनिश्चितता और आत्मसंघर्ष से भरे इन भावों में एक अकेली रूह की पुकार है – जो कभी अपने प्रिय को पुकारती है, कभी जीवन की राहों से सवाल करती है, तो कभी अंधेरों में खुद को एक जुगनू की तरह जलता हुआ महसूस करती है। ये पंक्तियाँ उस मन की आवाज़ हैं जो भटकते हुए भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

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वापसी के रास्ते….

“जब हम इश्क़ की राह पर चलते हैं, तो सब कुछ नया, ताज़ा और सुंदर लगता है। लेकिन वही राह जब लौटने की बनती है, तो हर पेड़, हर हवा, हर मोड़ अजनबी सा लगता है। इश्क़ के रास्ते पर हम खुद को कहीं पीछे छोड़ आते हैं… और वापसी की राह असल में उसी खोए हुए ‘ख़ुद’ की तलाश बन जाती है।”

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“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

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मुंबई में आयोजित हुआ ‘केवल काव्य परिवार’ का भव्य काव्य संध्या समारोह

चेन्नई से पधारे कवि-उद्योगपति केवल कोठारी के सम्मान में हुआ आयोजन नवी मुंबई, 14 जून साहित्यिक प्रेमियों के लिए शनिवार की शाम खास रही, जब सेक्टर-21, खारघर में आयोजित हुई एक भावपूर्ण और भव्य काव्य संध्या। यह आयोजन “केवल काव्य परिवार” के संस्थापक, चेन्नई से पधारे उद्योगपति व कवि श्री केवल कोठारी के मुंबई आगमन…

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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प्रोफेसर अजहर हाशमी नहीं रहे

“हर विषय और हर शख्सियत पर जब वे लिखते हैं, तो पढ़ने वाला पढ़ता ही रह जाता है।”
यह पंक्ति प्रोफेसर हाशमी की अद्भुत लेखनी और ज्ञान की गहराई को दर्शाती है, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

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फिर से… सिर्फ अपने लिए

रेखा ने बचपन में जो कहानियाँ लिखना शुरू किया था, वो ज़िंदगी की दौड़ में कहीं खो गया था। लेकिन एक पुरानी सहेली की एक बात ने उसके भीतर की सोई हुई लेखिका को फिर जगा दिया। धूल भरी कॉपी, सूखे फूल, और अधूरी कहानियाँ — सब फिर से ज़िंदा हो उठे। कभी-कभी ज़िंदगी वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है।

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सम्मान की सूखी रोटी

मैंने तुम्हारी बातों में आकर अपना परिवार छोड़ दिया और तुमने मुझे धोखा दिया,” प्रियांशी के स्वर में टूटे हुए सपनों की गूंज थी। लेकिन जवाब में जो मिला, वो और भी ज़्यादा चुभने वाला था – “तुम जैसी औरतों की कोई इज्जत नहीं…”

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