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साक्षी

एक स्वप्न, जो केवल देखा नहीं जाता — बल्कि देखा जाता है, उसे देखते हुए। यह कविता दृष्टि, अनुभूति और अस्तित्व की उस हल्की परत को छूती है जहाँ देखने और देखे जाने की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।

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प्रेम की छोटी सी सल्तनत

एक छोटी-सी सल्तनत, कुछ किताबें, एक बिस्तर और दो दिल—इस कहानी में प्रेम के वे पल कैद हैं जो हँसी और आँसुओं के बीच कहीं मुकम्मल होते हैं। कभी झिझक, कभी झेंप, और एक आलिंगन—जो बरसों बाद भी उतना ही सुकून देता है जितना पहली बार।

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प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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