संस्कृत भाषा और संस्कृत पत्रिका

एक दिन कुछ बच्चों के बीच बैठी मैं पत्रिकाओं की और उसे पढ़ने की बात कर रही थी। उसी क्रम में मैंने उनसे संस्कृत पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो वे हँस पड़े। बोले – “संस्कृत तो यूँ भी डेड भाषा है आंटी! उसकी पत्रिका कैसे निकल सकती है? और कौन पढ़ेगा?”

शायद वे सही कह रहे थे।
आज जब बोलियाँ समय के बहाव में सिर्फ एक भाषा अंग्रेज़ी और शहरीकरण के कारण मर रही हैं, तो वर्षों पहले की संस्कृत पत्रिकाओं को ये बच्चे कैसे जान सकते हैं? कैसे जान सकते हैं कि महर्षि पाणिनि की रची यह भाषा कई भाषाओं की जननी है, जिसे दशम मंडलों की भाषा कहा जाता है, वैदिक भाषा कहा जाता है और जिसे हम देववाणी कहते हैं।

Read More

शब्द मेरे भाव मेरे

उमड़ते भावों कोशब्दों में उकेरनान जाने यह शौक !कब और कैसे पनप गयानन्हा पौधा था जोअब वृक्ष बन गयाकुछ तो बचपन से ही थाप्रकृति का सान्निध्य मिलास्वयं ही हरा-भरा हो गयापानी के स्पर्श मात्र से हीखूब फल-फूल गयाउर्वरा के सान्निध्य मेंदोगुना हो गयामानों इच्छाओं कोखुला आकाश मिल गया। निरुपमा सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर Post Views:…

Read More