संस्कृत भाषा और संस्कृत पत्रिका
एक दिन कुछ बच्चों के बीच बैठी मैं पत्रिकाओं की और उसे पढ़ने की बात कर रही थी। उसी क्रम में मैंने उनसे संस्कृत पत्रिकाओं के बारे में पूछा तो वे हँस पड़े। बोले – “संस्कृत तो यूँ भी डेड भाषा है आंटी! उसकी पत्रिका कैसे निकल सकती है? और कौन पढ़ेगा?”
शायद वे सही कह रहे थे।
आज जब बोलियाँ समय के बहाव में सिर्फ एक भाषा अंग्रेज़ी और शहरीकरण के कारण मर रही हैं, तो वर्षों पहले की संस्कृत पत्रिकाओं को ये बच्चे कैसे जान सकते हैं? कैसे जान सकते हैं कि महर्षि पाणिनि की रची यह भाषा कई भाषाओं की जननी है, जिसे दशम मंडलों की भाषा कहा जाता है, वैदिक भाषा कहा जाता है और जिसे हम देववाणी कहते हैं।
