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हिंसा और अहिंसा

हिंसा और अहिंसा केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच और कर्म की दिशा हैं। कोई शरीर को मारता है, कोई मन को—और दोनों ही पीड़ा छोड़ जाते हैं। जो तड़पते को देखकर भी अकड़ जाए, वही सच्ची हिंसा है; और जो बिना कहे दुख हर ले, वही अहिंसा। जीवन की असली परीक्षा वहीं है, जहाँ करुणा सवाल बनकर खड़ी हो जाती है।

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