धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

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एक प्याली चाय… और पीछे छुपा पूरा असम

“भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू। हर सुबह की शुरुआत, हर शाम की थकान, दोस्तों की हंसी और दफ्तर की भागदौड़—इन सबके बीच कहीं न कहीं असम की मिट्टी और मेहनत की खुशबू घुली होती है। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी और मेहनती मजदूरों की तपस्या से निकली हर चाय की चुस्की सिर्फ स्वाद नहीं, एक संस्कृति, संघर्ष और सम्मान की दास्तान सुनाती है।”

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रेत से ख़्वाब आँखों में आफ़ताब

ज़िंदगी हर रोज़ रेत-सी थोड़ी-थोड़ी फिसलती जाती है, और आँखों में ख्वाब आफ़ताब की तरह जलते हैं। कामयाबियों की चर्चा तो सब करते हैं, मगर नाकामियों से जब सामना हुआ था, उसका भी कभी हिसाब देना पड़ेगा। समाज की यही रीत है कि वह चैन से जीने नहीं देता और अनचाहे सवालों के जवाब मांगता है। दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी करतूतों की किताब खोलकर देखनी चाहिए। फकीर फकीर ही रहा, क्योंकि उसने चापलूसी नहीं की – वहीं नवाब बनते गए जो मीठी बातों में उलझे रहे। लेकिन जिसने सच कहा, वो हमेशा गलत समझा गया। फिर भी, अपने विश्वास की चाल न टूटी है, न टूटेगी।

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‘मन निर्मोही’

स्वाभिमान की चोट से आहत मन ने पहले सहजता से सहा, फिर आक्रोशित होकर न्याय की उम्मीद में संघर्ष किया। विश्वविद्यालय और सचिवालय की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते उसने सच्चाई के दबे-सिसकते स्वर को देखा। छल और प्रपंच के बीच भी उसने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। परंतु जब न्यायालय की प्रक्रिया भी ठंडी पड़ी मिली, तो अंततः मन निर्मोही हो गया।

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