दिल को छूती मौन की गूँज…
“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”

“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”
यह रचना युद्ध और विनाश के बीच मासूम बच्चों की दृढ़ता और आशा को सामने लाती है। चारों ओर मलबा, बारूद की गंध और प्रियजनों की लाशों का दर्द भरा माहौल है, लेकिन बच्चे अब भी खेल रहे हैं, हँस रहे हैं और जीवन को थामे हुए हैं। उनकी हँसी एक विरोधाभास है—जहाँ दुख का महासागर गहरा है, वहीं उनकी निश्छलता और दिलकश मुस्कान उम्मीद की किरण जगाती है।
नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”