श्रीदेवी चश्मे में
मोबाइल और वीडियो गेम से पहले हमारा बचपन माचिस की छापों और फिल्मी पोस्टरों में बसा था। छाप खेलते हुए रेल पटरियों पर खज़ाना ढूँढना, रेयर माचिस पर रौब दिखाना और फिर ताश जैसे पत्तों में दांव लगाना“श्रीदेवी चश्मे में!”ये सिर्फ़ शब्द नहीं, पूरे दौर की धड़कन थे। वह खेल बिना पैसों का था, पर यादों से भरपूर।
