Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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मन के अहाते का पेड़

कृष्णा तिवारी कृति, प्रसिद्ध लेखिका, नागदा जंक्शन (मध्यप्रदेश) खलिश काएक पेड़ लगा हैमन के अहाते मेंखटकता है सुनापनकाश..उसकी फुनगी पर भीकलियाँ आती..पतझड़ के बाद बसंतफिर सावन,बस,, यही सावन..राखी का….नयनों को और सावन कर जातापल्लू में बंधे आशीषधरातें कभी दुआए देहरी परसुनें पेड़ का मनआसमान हों जातावो फल भरी डालियाँझुमती है मन के अहाते मेंमगर दूसरे…

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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