एक दुआ

यह कविता एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति है, जहाँ वह अपने सुख और उम्र तक को त्याग कर संतान के लिए उज्ज्वल, सुरक्षित और छायादार जीवन की कामना करती है।

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एक शब्द नहीं, पूरा ब्रह्मांड है माँ

माँ कोई साधारण शब्द नहीं है। वह भाषा के नियमों से आगे जाकर संवेदना का रूप ले लेती है। उसे किसी संज्ञा, सर्वनाम या अलंकार में बाँधने की हर कोशिश अधूरी रह जाती है। माँ की ममता किसी कविता, किसी छंद या महाकाव्य की सीमा में नहीं समाती। वह एक ऐसा अनंत विस्तार है, जिसे समझने का प्रयास करते-करते शब्द स्वयं छोटे पड़ जाते हैं।

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खुद से खुद की जंग

तुम्हारे जाने के बाद ज़िंदगी अचानक खाली हो गई थी। जो आदतें कभी सुकून देती थीं, वही अब चुभने लगीं। तब समझ आया कि सहारे पर जीना आसान होता है, पर खुद खड़े होना सीखना ज़रूरी। उसी खालीपन में मैंने खुद को पहचाना और धीरे-धीरे अपनी ही ज़िंदगी की लड़ाई लड़ना सीख लिया।

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हवा का झोंका

हवा का वह झोंका, जो अपना रास्ता भूलकर आँगन में आया, जैसे पूरी जगह को जीवित कर दिया। मैं चुपचाप एक कोने में खड़ी थी, पास वाले घर से प्रार्थना की धुन कानों में गूंज रही थी। ठंडी हवा, टिमटिमाता दिया, और सुगंधित समय सब मिलकर उस पल को शांति और प्रकाश से भर देते थे। हर लम्हा जैसे सपनों का गीत गा रहा हो, और मेरी आत्मा भी उसी संगीत में घुलमिल रही हो।

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“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।

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तुम और तुम्हारी यादें…

उस स्त्री की पीड़ा जो भुलाने की हर कोशिश के बावजूद स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाती। वादों से भरे प्रेम का अचानक टूट जाना, चुपचाप सहा गया अत्याचार और अकेलेपन में बहते आँसू—सब मिलकर एक ऐसी कहानी रचते हैं जहाँ प्रेम भले ही दूर हो जाए, पर उसकी यादें भीतर ज़िंदा रहती हैं। दूरी के बावजूद दो आत्माएँ एक-दूसरे की प्रतीक्षा में बँधी रहती हैं, जैसे एक ही परिंदे के दो पंख।

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सावन, राखी और एक खाली दहलीज़

हर बेटी के लिए मायका सिर्फ़ घर नहीं, सांसों की मिट्टी होता है।पर कुछ बेटियों के हिस्से वो आँगन नहीं आता, जहां राखी, सावन और तीज मुस्कुराते थे। उनके त्योहार भी सादे, आंखें भीगी, और दिल भीतर से थोड़ा रिक्त रहता है…

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“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

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बेटियाँ

बेटियाँ घर की रौनक होती हैं चहकती, खिलखिलाती, और दिलों को जोड़ने वाली। बचपन से समझदार बनने तक, और विदाई के क्षण तक, वे अपनी यादें, प्यार और भावनाएँ एक संदुकची में समेटे चली जाती हैं।

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कितनी अमायरा!

अखबारों की सुर्खियाँ कभी–कभार दहला देती हैं.जान देती बच्चियाँ, दबा दी जाती चीखें,और घोंघे सी रफ्तार से सरकतीं फाइलें। कुछ अमायरा साहस करती हैं, कुछ सहती हैं, कुछ ज़हर के घूंट पी जाती हैं…और कुछ अंतिम मुक्ति चुन लेती हैं।
बाल-दिवस पर याद आती है अमायरा. जिसकी मासूमियत दुनिया की क्रूरता से हार गई।

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