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जय मां गंगा

“गंगा उदास है… मेरी गंगा उदास है।”
भगीरथ की तपस्या से धरती पर उतरी माँ गंगा आज मनुष्य के कर्मों से मलीन हो उठी है। कभी संतों के चरणों में बहकर जग का संताप हरने वाली मंदाकिनी, आज प्रदूषण और उपेक्षा से व्यथित है। अपनी ही संतान के हाथों अपवित्र होती इस पावन धारा का मौन करुण क्रंदन — हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण बन गया है।यह कविता केवल गंगा की वेदना नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विलाप है, जिसने अपनी ही संस्कृति के प्रतीक को आघात पहुँचाया है।

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 हिंदी : हिंद देश का हृदय स्पंदन 

हिंदी हिंद देश का हृदय है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और अस्मिता का ध्वज है। पौराणिक ग्रंथों की महिमा, संतों की वाणी और क्रांति के स्वर सभी हिंदी में गूँजते हैं। मां की लोरी-सी निर्मल और सभी रसों की खान यह भाषा राष्ट्र की आत्मा को स्पंदित करती है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी और मीरा की भक्ति की छवि इसमें झलकती है। यही कारण है कि हिंदी हमारी आन-बान-शान ही नहीं, बल्कि भारत का अभिमान है। हमें इसे केवल राजभाषा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा का सम्मान देना चाहिए।

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तिरंगा – हमारा मान

भारत में “तिरंगा” शब्द भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को संदर्भित करता है। हर स्वतंत्र राष्ट्र का अपना ध्वज होता है, जो उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज को उसके वर्तमान स्वरूप में 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता से कुछ दिन पहले, 22 जुलाई 1947 को आयोजित संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था। यह 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में और उसके बाद भारत गणराज्य के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कार्य करता रहा।

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