‘नाटक’
यह दार्शनिक कविता जीवन को एक सराय और सुख-दुख को एक नाटक के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘मैं’ और अहंकार के मंथन के बीच यह रचना कर्म, परिवर्तन और प्रेम की त्रिवेणी का संदेश देती है। जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मबोध की रोशनी को उजागर करती यह कविता पाठक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है।
