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सूर्योदय के समय जीवन-यात्रा का प्रतीक एक राहगीर और प्राचीन सराय का दृश्य

‘नाटक’

यह दार्शनिक कविता जीवन को एक सराय और सुख-दुख को एक नाटक के रूप में प्रस्तुत करती है। ‘मैं’ और अहंकार के मंथन के बीच यह रचना कर्म, परिवर्तन और प्रेम की त्रिवेणी का संदेश देती है। जीवन की क्षणभंगुरता और आत्मबोध की रोशनी को उजागर करती यह कविता पाठक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है।

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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