सुनहरी ज़ंजीरें
मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।

मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।
हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।
हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।