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इंतज़ार में डूबी प्रेमिका, जो अपने प्रिय की याद में खिड़की के पास बैठी है

तुम दूर हो या क़रीब ?

जब संवाद थम जाता है और इंतज़ार लंबा हो जाता है, तब प्रेम अपने भीतर सवालों की शक्ल लेने लगता है। यह रचना उसी असमंजस को स्वर देती है, जहाँ नज़दीकियाँ इतनी गहरी रही हैं कि दूरी का अर्थ समझ में ही नहीं आता। प्रेम में किया गया भरोसा, व्यस्तताओं के बीच पनपती बेचैनी और यह डर कि कहीं अपना व्यक्ति धीरे-धीरे दूर तो नहीं हो रहा इन्हीं भावों के बीच यह कविता पाठक को रिश्तों की सबसे कोमल और सच्ची अनुभूति से जोड़ती है।

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