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एक टूटा हुआ काँच का गिलास और खिड़की के पास उदास मुद्रा में बैठा व्यक्ति, जीवन और रिश्तों के टूटने का प्रतीक

टूटना

यह कविता ‘टूटना’ शब्द के बहाने जीवन की उन सभी चीज़ों को छूती है, जिनका टूटना केवल भौतिक नहीं बल्कि भावनात्मक और अस्तित्वगत पीड़ा भी बन जाता है। पेंसिल की नोक से लेकर रिश्तों और विश्वास तक हर टूटन एक गहरी चुप्पी छोड़ जाती है।

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river

नदी के आँसू

दी रोती भी है—पर पहाड़ उसकी आँखों के आँसू देख ही कहाँ पाते हैं। वो अपनी ऊँचाई की अकड़ में तने रहते हैं। उन्हें लगता है नदी तो बस बादलों की आवारा सखी है, बहती है, गुज़रती है… बस।

पर हक़ीक़त यह है कि पहाड़ की ऊँचाई को हरियाली, जीवन, शब्दसब कुछ नदी ही देती है। वही उसके अस्तित्व को अर्थ देती है। ऊँचाई अकेली कुछ नहीं होती गहराई चाहिए। और गहराई नदी ही देती है।

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