अधूरी चाय, अधूरा इश्क़
चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।
यह रचना एक छूटी हुई कॉल के बहाने मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध, थकान और रिश्तों की अनकही दूरियों को उजागर करती है। रोज़मर्रा की भागदौड़, शारीरिक पीड़ा और मानसिक उलझनों के बीच छूटे छोटे-छोटे क्षण किस तरह गहरे पछतावे में बदल जाते हैं, यही इसका केंद्र है। एक साधारण-सी छूटी कॉल यहाँ जीवन के बड़े संकट, टूटते संबंधों और भीतर की असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।