“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

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क्या बुज़ुर्ग सच में अकेले पड़ रहे हैं?

84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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दिया और कुम्हार

कविता उस कुम्हार की करुण कथा कहती है, जो मिट्टी के दिये बनाकर दुनिया के हर घर में उजाला फैलाता है, पर उसका अपना जीवन अंधकार में डूबा रहता है। वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपनी बेटी की पढ़ाई, विवाह, माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर सके। फिर भी लोग उसके परिश्रम की कीमत पर सौदा करते हैं, मानो एहसान कर रहे हों। त्योहार की चमक में उसकी मेहनत की सच्चाई गुम हो जाती है।

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जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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स्वाभिमान

हर रोज मैट्रो स्टेशन पर भीख मांगती वह अंधी भिखारन मेरी नजरों के सामने होती।
एक दिन उसकी तबियत ठीक न होने पर मैंने देखा कि उसकी देखभाल एक जवान लड़की कर रही थी। कई सालों के दर्द और असहायता के बावजूद, उस बच्ची ने उसकी सेवा को अपना स्वाभिमान बना लिया। भीख मांगना नहीं, बल्कि सहयोग और मानवता की यही असली पहचान है।

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मैं कैसे हार मान लूं…

यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”

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बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

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इसी तरह सोचो

यह कविता जीवन और संघर्ष की कठिनाइयों में महिलाओं को आत्मनिर्भर और साहसी बनने का संदेश देती है। कविता में बताया गया है कि जैसे लोहा आग में पिघलकर भी अपनी ताकत नहीं खोता, वैसे ही महिलाओं को भी कठिन परिस्थितियों में अपने साहस और आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। ‘बिटिया’ के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जीवन के जंगल में जिंदा रहने के लिए हिम्मत, धैर्य और साहस आवश्यक हैं।

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मैं सच को बयां करती हूं

डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन मैं सच को बयां करती हूंअंगारों पर चलती हूंमैं गीत नए रचती हूंख्वाब नए चुनती हूं गहन तम को चीरकरअरुणिमा जगाती हूंटूटकर बिखरती हूंखुद को पिरो लेती हूं सूरज से आग लिएदीपक से राग लिएधरती का हरितस्वप्नआंचल में सजाती हूं कांटो की पृष्ठ परफूलों की कलम सेवसंत की आस लिएपतझड़…

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बस अब और नहीं 

सान्वी ने सुबह की सारी व्यस्तताओं से निवृत्त होकर बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों को निहारना शुरू किया। उसी समय उसके भीतर लंबे समय से चल रहे संघर्ष और आंतरिक तूफ़ान ने नया रूप ले लिया। अतीत के घाव, निराशा और खुद से होने वाली आत्मग्लानि ने उसे झकझोर दिया। और तभी उसने ठान लिया. बस, अब और नहीं!”उसने अपने अनवरत युद्ध को विराम देने का साहस जुटाया, और अपने अंतर्मन पर पूर्ण नियंत्रण पाकर आत्मा की जीत का अनुभव किया।

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