कुसुम का धागा

सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.

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छोटी मदद, बड़ा असर

मॉल में आम दिन जैसा लग रहा था, लेकिन 4 साल की आन्या ने दिखा दिया कि छोटी-सी मदद भी बड़ा असर डाल सकती है। अपने बलून और कपकेक्स का पैकेट लिए वह मुस्कुराते हुए उस बच्ची को दे देती है, जिसे कोई नहीं देख रहा था। माता-पिता की नजरों के सामने यह नन्हीं सी मानवता का सबक, उनके दिलों को छू जाता है और समाज में मदद और दयालुता का संदेश फैलाता है।

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दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।

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नीयत अच्छी हो तो मजहब दीवार नहीं बनता

वो दिन आज भी स्मृति में ताजे हैं, जब बिहार के छपरा शहर में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे थे. चारों ओर डर का माहौल था, एक अनजानी आशंका हर घर के आंगन में सन्नाटा बनकर पसरी हुई थी. उन्हीं कठिन दिनों में, हमारे घर में एक गरीब मुस्लिम लड़का भी रहता था, जो गांव से पढ़ाई के लिए भेजा गया था.
उसे पापा के किसी पुराने मित्र ने यह कहकर भेजा था कि बेटा पढ़ाई में बहुत तेज़ है, लेकिन हालात ठीक नहीं हैं्. आपने बहुतों की मदद की है, आज इसे भी आपके सहारे की ज़रूरत है.

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वह बहक गई थी…

“महान बनने की चाहत में वह बहक गई थी, लेकिन इस युग में महानता नहीं, इंसान को पढ़ने की आवश्यकता है। न कोई विद्यालय, न परीक्षा, केवल परिणाम — जो या तो हानि देगा या लाभ। संवेदनशीलता की अति पागलपन की ओर ले जाती है, जहाँ न कोई पहचान होती है, न कोई अस्तित्व, बस एक मानसिक रोगी का दर्जा। यही है महान बनने की प्रक्रिया का असली संघर्ष।”

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जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित

Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।

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