बदलता वक़्त…
“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।

“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।
झामरी एक ट्रांसजेंडर गोल्डन रिट्रीवर थी, जो गुमनामी में आई और चुपचाप सबकी प्रिय बनकर चली गई। माताजी मंदिर के सामने बिताया उसका शांत जीवन, अनिल परमार का स्नेह और अंत में सम्मानजनक विदाई यह सिखाती है कि करुणा और अपनापन शब्दों के मोहताज नहीं होते।
भरोसा जीवन की वह डोर है, जो हमें स्वयं से लेकर दूसरों और अंततः ईश्वर तक जोड़ती है। विपरीत परिस्थितियों में जब अपने प्रयास नाकाफी पड़ जाएँ, तब किसी अपरिचित का बढ़ा हुआ हाथ ईश्वर जैसा लगता है। जीवन की यह राह आपसी विश्वास पर ही चलती है और अंत में भरोसा यही कहता है, “जो भी होगा, अच्छा ही होगा।”
वी घाव चाटकर बिल्ली को ठीक करती है, कबूतर के मरने पर रोती है, और हर जीव को अपनाने की अद्भुत ताकत रखती है। कभी-कभी लगता है वह बोल नहीं सकती, पर सुनना, समझना और प्रेम बाँटना उसे हम इंसानों से कहीं बेहतर आता है।
वक्त ने हमसे कई अपने छीन लिए, वरना हमारा कारवां भी कभी बड़ा हुआ करता था। हमने भी कभी रेत पर सपनों के रंगों से शब्द लिखे थे, पर लहरों का जोर इतना था कि सब मिट गया। भयानक आंधियों में भी आसमान तो ठहरा रहा, मगर पंछियों की चोंच खाली थी। जिसे अपने हुनर पर पूरा भरोसा था, वही शहर की बिगड़ी हवा में गुम हो गया। जिस पेड़ ने जिंदगी भर छाँव दी, उसी पेड़ से उसने रिश्ता तोड़ लिया। जो हमेशा दूसरों की थालियाँ भरता रहा, आज उसकी अपनी थाली खाली है। अब उसने आसमान की फिक्र छोड़ दी है . बस ज़मीन को सिर पर उठाकर आगे बढ़ना सीख लिया है।
सुबह की चाय का कप हाथ में लिए मैं अख़बार पढ़ रही थी कि एक खबर ने जैसे दिल को भीतर तक हिला दिया इंदौर में बस में छूटा नवजात शिशु, मां-बाप फरार.
खबर छोटी थी, पर असर बड़ा. कुछ पंक्तियों में लिखी उस घटना के पीछे जाने कितनी कहानियां दबी थीं. लिखा था. एक दंपत्ति बस में सवार हुए, गोद में एक नन्हा सा बच्चा था, मुश्किल से पंद्रह दिन का. थोड़ी देर बाद वे बोले कि कुछ सामान लेना है, बस से उतर गए.
मॉल में आम दिन जैसा लग रहा था, लेकिन 4 साल की आन्या ने दिखा दिया कि छोटी-सी मदद भी बड़ा असर डाल सकती है। अपने बलून और कपकेक्स का पैकेट लिए वह मुस्कुराते हुए उस बच्ची को दे देती है, जिसे कोई नहीं देख रहा था। माता-पिता की नजरों के सामने यह नन्हीं सी मानवता का सबक, उनके दिलों को छू जाता है और समाज में मदद और दयालुता का संदेश फैलाता है।
हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।
हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।