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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा

ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।। जो भी आया शरण तुम्हारी, उसको तुमने अपनाया।जड़-मूरख मन में भी, तुमने ज्ञान का दीप जलाया।सदा सिखाया बच्चों को करना आदर-सम्मान।ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको…

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