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दादी के आँचल का सिरा पकड़े पार्क में चलती छोटी पोती

दादी का आँचल

अमिता श्रीवास्तव “दादी, हाथ कहाँ पोंछूँ?” मॉल के फूड कोर्ट में वॉफल खाकर चॉकलेट से सनी अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए अंबू मेरे सामने खड़ी थी। पाँच साल की अंबिका मेरी अंबू थी। “रुको, अभी रूमाल देती हूँ।” कहकर जैसे ही मैं अपना पर्स खोलने चली, उसने झट मेरे आँचल में अपनी हथेलियाँ पोंछ लीं। क्रीम…

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पुरानी रेल यात्रा में भारतीय परिवार घर से लाई आलू-पूरी खाते हुए

याद न जाए बीते दिनों की!

कभी रेल यात्रा का मतलब था घर से बँधी आलू-पूरी, अख़बार में परोसी चाट, खिड़की से मिलती चाय और अनजान सहयात्रियों से बनती दोस्ती। आज सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन क्या सफ़र का वह अपनापन कहीं पीछे छूट गया है? बीते दिनों की यादों में डूबा एक आत्मीय संस्मरण।

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बाई की पुरानी पेटी और बाबूजी की पेटी में सहेजी बचपन की यादें

दो पेटियाँ, आधी सदी की यादें

दिवाली की सफाई में खुलती बाई की पेटी और बाबूजी की पेटी केवल पुराना सामान नहीं, बल्कि बचपन, माता-पिता के स्नेह और आधी सदी पुरानी यादों का खजाना हैं। इन पेटियों से जुड़ा यह संस्मरण बीते समय और परिवार की अनमोल स्मृतियों को फिर से जीवंत करता है।

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माँ के हाथों से बने पारंपरिक भोजन के साथ बचपन की यादों को दर्शाता भावुक पारिवारिक दृश्य

यादों की गलियों में लौट चलें

माँ के हाथों का स्वाद केवल भोजन का स्वाद नहीं, बल्कि ममता, त्याग और निस्वार्थ प्रेम की ऐसी विरासत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे साथ चलती है।

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अम्मां के आंचल और गांव की पुरानी यादों को दर्शाता रामगढ़ गांव का ग्रामीण दृश्य

मेरा गांव जैसे अम्मां के आंचल की छांव 

सन् 1976 का रामगढ़ गांव, अम्मां का स्नेह, मिट्टी की खुशबू, लालटेन की रोशनी, चूड़ियों की छन-छन, दशहरे का मेला और बचपन की बेफिक्र दुनिया. यह संस्मरण उस समय की याद दिलाता है जब गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि रिश्तों, संस्कारों और अपनापन से भरी पूरी दुनिया हुआ करता था.

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बचपन की दो भारतीय सहेलियाँ खेतों और गाँव की पगडंडी पर हँसते हुए हाथों में हाथ डाले चलती हुईं, जो सच्ची दोस्ती और सुनहरे बचपन की यादों को दर्शाती हैं।

दोस्ती जो उम्रभर साथ रही : मेरी बेस्ट फ्रेंड वीणा

यह संस्मरण बचपन की उन सुनहरी यादों को जीवंत करता है, जहाँ बहन और सहेली का रिश्ता जीवनभर की सबसे बड़ी पूँजी बन जाता है। स्कूल, खेल, संयुक्त परिवार और निस्वार्थ मित्रता की यह कहानी हर पाठक को अपने बचपन की याद दिलाएगी।

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दो बचपन के दोस्त वर्षों बाद मिलते हुए, सच्ची दोस्ती और पुराने रिश्ते को दर्शाता भावनात्मक दृश्य।

30 साल बाद भी कायम है श्याम सिंह का साथ

कुछ दोस्त रिश्तों से नहीं, दिल से जुड़े होते हैं। श्याम सिंह और उनके दोस्त की 30 साल पुरानी दोस्ती बताती है कि सच्चा साथ समय और परिस्थितियों से कभी नहीं बदलता।

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डोरी से चलने वाला पारंपरिक झालरदार बीजना, जिसके नीचे गर्मी की दोपहर में परिवार सुकून से विश्राम कर रहा है।

रेशम की डोरी..

आधुनिक बिजली के पंखों और एसी के दौर में भी कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो मन को बरबस अतीत में ले जाती हैं। यह कविता “साटन का मोरा बीजना” पुराने समय के डोरी से चलने वाले झालरदार बीजने, घर-आँगन की आत्मीयता, संयुक्त परिवार की मधुरता और बचपन की सुकून भरी दोपहरों का मार्मिक चित्रण करती है।

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नीली जुबान और जामुन

नीली जुबान….!

जामुन की नीली जुबान, बचपन की मासूम खुशियां, आईने के सामने की शरारतें और सेहत से जुड़ी अनमोल बातें यह लेख जामुन के स्वाद, यादों और उसके औषधीय गुणों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है।

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मंद मुस्कान के साथ खड़ी एक युवती, जिसकी आँखों में बचपन और प्रेम की मासूम यादें झलक रही हैं।

लम्हा

कुछ रिश्ते उम्र नहीं, एहसास जीते हैं। “लम्हा” कविता सोलह-सत्रह की मासूमियत, बचपन की खुशबू और प्रेम की कोमल मुस्कुराहटों को बेहद संवेदनशीलता से उकेरती है।

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