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रिश्तों की अहमियत समझो, डस्टबिन में मत डालो

सब्ज़ियों की मंडी से शुरू हुई यह स्मृतियों की यात्रा रिश्तों तक पहुँचती है, जहाँ लेखक अतीत और वर्तमान की तुलना करते हुए बताता है कि जैसे सब्ज़ियाँ बासी होकर फेंक दी जाती हैं, वैसे ही आज रिश्ते भी संवेदना के अभाव में डस्टबिन तक पहुँच जाते हैं।

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माँ तो माँ होती है…

माँ का साथ शब्दों का मोहताज नहीं होता। कभी वह धूप में छाता बन जाती है, तो कभी जीवन की भीड़ में सहारा। उम्र भले ही शरीर पर अपना असर छोड़ दे, पर माँ की मौजूदगी वही सुकून देती है. निःशब्द, निःस्वार्थ और पूरी तरह सुरक्षित। माँ के साथ बिताया हर पल स्मृति बनकर जीवन भर साथ चलता है

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भारतीय रेल यात्रा के दौरान परिवार के साथ रखा पारंपरिक बिस्तरबंद

बिस्तरबंद: जब सफ़र में घर साथ चलता था

एक समय था जब हर यात्रा का सबसे भरोसेमंद साथी “बिस्तरबंद” होता था। उसमें सिर्फ बिस्तर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सहूलियत, बचपन की जिज्ञासाएँ और सफ़र की गर्माहट बंद होती थी। आज भले ही एयरबैग ने उसकी जगह ले ली हो, पर यादों में बिस्तरबंद अब भी ज़िंदा है।

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बिना स्क्रीन का बचपन

बचपन में आम की गुठलियाँ हमारी खुशियों का साधन थीं। महिदपुर रोड की गलियों में बिखरी गुठलियाँ अंकुरित होकर छोटे पौधे बन जाती थीं। हम उन्हें उखाड़कर घर लाते, पत्थर पर घिसते और फूँक मारकर सुनते “बज रहा है या नहीं।” टूटती गुठली पर डाँट और मार भी सहते, फिर अगले दिन फिर से तलाश में निकल पड़ते। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, वह सिर्फ़ खेल नहीं था. धैर्य, लगन और छोटे-छोटे प्रयासों की सीख भी थी, जो अब तक दिल में धीरे-धीरे बजती रहती है।

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यह घर बहुत हसीन है

मेरी ज़िंदगी एक जगह से शुरू नहीं हुई।
वह एक किराए के मकान से दूसरे तक भटकती रही। यह घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट से नहीं बना, इसमें हमारे डर, संघर्ष और सपने बसे हैं। इसीलिए यह साधारण-सा घर मेरे लिए बहुत हसीन है।

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अपुन की दादीगीरी

पाँचवीं से छठवीं में कदम रखते ही स्कूल मेरे लिए पढ़ाई से ज़्यादा एक अजीब अनुभव बन गया था। कक्षा में न विद्यार्थी थे, न प्रतिस्पर्धा सिर्फ़ मैं और मेरा वर्चस्व। पिता का अनुशासन, स्कूल में उनका रुतबा और मेरी अकेली उपस्थिति ने मुझे अनजाने ही “दादीगीरी” का ताज पहना दिया। यह दादीगीरी डर से नहीं, परिस्थितियों से उपजी थी. जहाँ सीखने के साथ-साथ प्रभुत्व भी अभ्यास का हिस्सा बन गया।

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“तुम्हारे खतों का पुलिंदा”

तुम्हारे खतों का वह पुलिंदा, जिसे मैंने संदूक में संभाल रखा था, मेरे लिए समय की किताब बन गया है। हर खत अपनी कहानी कहता है कभी देर से उठने की डांट और चाय के ठंडे निशान याद दिलाते हैं, तो कभी तुम्हारी छुटकी की मुस्कान और टीचर की डांट में बचपन की मासूमियत झलकती है। कुछ खत चोट के निशानों, पहली तकरार की मिठास या पहला चुंबन याद दिलाते हैं।

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समय बदला पर मेरी यादों का मेला नहीं

गोगापुर का मेला मेरे लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बचपन की वह दुनिया है जहाँ उत्साह, जिज्ञासा और अपनापन एक साथ साँस लेते थे। बैलगाड़ी में बैठकर मेले की ओर जाना, दाल-बाटी की खुशबू में भूख से ज़्यादा आनंद महसूस करना और ज़मीन पर बैठकर टूरिंग टॉकीज़ में फ़िल्म देखना ये सब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गए। आज मेला भले ही बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह अब भी वैसे ही जीवित है, जैसे समय ने उसे छुआ ही न हो।

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जब आती थी रामलीला..

महिदपुर रोड पर आयोजित रामलीला में हनुमान जी की झांकी सबसे रोमांचकारी थी. केले और फलों से लदे पेड़ों को छलाँग लगाकर तोड़ते, अशोक वाटिका उजाड़ते, और कभी-कभी फल दर्शकों की ओर उछालते। दर्शक इसे श्रद्धा से हनुमान जी का प्रसाद मान लेते थे।

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कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

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