राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को समर्पित हिंदी कविता

सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर
प्रातःकालीन देव दिवाकर,
भासित करते जो भू-अंबर,
ओज-तेज के राष्ट्रकवि वो,
कहलाए जग में ‘दिनकर’।
अनुपम कृति ‘रेणुका’ रची जो,
गौरव-गाथा गाती है,
सामयिक नीरसता की वेदना,
जन-मानस तक लाती है।
वर्तमान की विकल दशा पर,
जब आक्रोश उमड़ आया,
रच डाली ‘हुंकार’ प्रलय की,
मन का संशय मिटाया।
‘रसवंती’ में रस का सागर,
अनुपम सौंदर्य-समर्पण है,
शब्द-शब्द में रूप झलकता,
काव्य नहीं, यह दर्पण है।
‘सामधेनी’ से जागृत की थी,
सोई सामाजिक चेतना,
देश-प्रेम की प्रखर लौ जली,
सुलग उठी वैश्विक वेदना।
‘कुरुक्षेत्र’ है महाग्रंथ,
जो सब रचनाओं पर भारी है,
महाभारत के महाकथानक की,
इसमें गाथा सारी है।
‘उर्वशी’ की काम-चेतना,
‘रश्मिरथी’ का शौर्य-सफर,
इन बिन काव्य-जगत है सूना,
विचार-भाव का बहता प्रखर।
भाव-पक्ष, प्रगतिवाद, छंद, रस,
अलंकारों का संगम-वर्णन
करने बैठूँ उनका, तो पड़ जाते
शब्द भी कम।
धन्य बिहार की पावन माटी,
जहाँ जन्म लिया ‘दिनकर’,
सिमरिया ग्राम हुआ दीप्यमान,
उदित हुए जैसे ‘भास्कर’।
