पैंतीस-चालीस की स्त्री
“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”

“पैंतीस-चालीस की स्त्री—घर की रौनक, रिश्तों की संरक्षक, प्रेम और वात्सल्य की सजीव प्रतिमूर्ति। बिना किसी दवा या शौक के, जीवन में खुशियाँ और आशा फैलाती। सच में, ये स्त्री कितनी खूबसूरत होती है।”
पुणे:जागतिक आत्महत्या प्रतिबंध दिवस (World Suicide Prevention Day) के अवसर पर पुणे में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने के लिए कैंडल मार्च का आयोजन किया जा रहा है। यह पहल कनेक्टिंग ट्रस्ट और रोटरी क्लब ऑफ पुणे सारसबाग की ओर से की जा रही है। मार्च शनिवार, 13 सितंबर 2025, को शाम 6 बजे संभाजी उद्यान,…
मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड (MPTB) को प्रतिष्ठित सर्वश्रेष्ठ राज्य पर्यटन बोर्ड पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान 9 सितंबर को ले मेरिडियन, नई दिल्ली में आयोजित भव्य इंडिया ट्रैवल अवार्ड्स 2025 समारोह में केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री, श्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा प्रदान किया गया। यह राष्ट्रीय स्तर की मान्यता मध्य प्रदेश के पर्यटन क्षेत्र में नवाचार, उत्कृष्टता और सतत विकास में नेतृत्व को दर्शाती है।
कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।
फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।
बिहार में शिक्षा की दिशा और दशा सुधारने के लिए शिक्षाविद्? और साहित्यकार ई. अंशु सिंह ने एक अनूठी पहल की है. शिक्षक दिवस के अवसर पर उन्होंने बिहार में 100 विश्वविद्यालय खोलने के लक्ष्य के साथ राज्यव्यापी भिक्षाटन अभियान की शुरुआत की. इस अभियान का उद्देश्य उच्च शिक्षा के विकल्प बढ़ाना और युवाओं को बिहार से बाहर पढ़ने की विवशता से मुक्त करना है. अभियान की शुरुआत भागलपुर में हुई, जहाँ बड़ी संख्या में शिक्षाविद्, प्राध्यापक और समाजसेवी उपस्थित रहे. इस अवसर पर ई. अंशु सिंह ने कहा कि यह केवल विश्वविद्यालय (university) खोलने की पहल नहीं है, बल्कि शिक्षा के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत है.
चाय की ख़ुशबू संग जब यादों की परतें खुलती हैं,
तो ज़िंदगी में खोया-पाया सब सामने आ खड़ा होता है।दिल अक्सर सोचता है — काश! जो चाहा था, वही मिल जाता… या ज़िंदगी एक और मौका देती।”
यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।
वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।
ग्यारह दिनों तक मेरे भक्त मेरे दर्शन को तरसते रहे और मैं उनके प्रेम से अभिभूत था। परंतु विसर्जन के दिन जब बारह घंटों तक जल में खड़ा रहा, तब मैंने सच्चाई देखी।
मंडपों में लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे, बहसबाजी कर रहे थे, आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे को गिरा रहे थे। सेवक भी अपना रोब दिखा रहे थे।
मैंने सोचा—पंडाल में नहीं तो क्यों न खुले आसमान और समुद्र की लहरों के बीच सबको समान रूप से दर्शन दूँ। वहाँ न कोई कतार, न कोई वीआईपी, न कोई भेदभाव। लेकिन… मेरे भक्तों ने वहीं भी मुझे याद दिला दिया कि इंसान ने भगवान को भी अपने बनाए हुए अमीर-गरीब और ऊँच-नीच के नियमों में बाँध दिया है।
मैं तो वही एकदंत गजानन हूँ—चाहे लालबाग में विराजमान रहूँ या किसी छोटे पंडाल में, या फिर गिरगांव चौपाटी की लहरों में।मेरे लिए सिर्फ एक ही चीज़ महत्वपूर्ण है—मन से की गई भक्ति। बाकी सब इंसानी दिखावा है।”**
चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।
घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।
यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है