प्रेम शाप है….

यहाँ प्रेम को शाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो नाश और विरक्ति के साथ-साथ एक अमरता का भाव भी लिए है। शहरों का विकास प्रकृति को निगल गया, परंतु शापित खंडहर अब भी अछूते हैं—मानो प्रेम भी उसी तरह समय और विनाश से परे जीवित रहता है। सूखी नदियाँ, वीरान इमारतें और तप्त अधर—ये सभी स्मृतियों और अधूरेपन के प्रतीक हैं। वक्ता मानो किसी पूर्वजन्म की स्मृति से बंधा हुआ है, और प्रेम को “सांकेतिक मरीचिका” कहकर उसकी अस्थिरता और मृगतृष्णा-सी प्रकृति को सामने लाता है।

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ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा

ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको अभिमान।। जो भी आया शरण तुम्हारी, उसको तुमने अपनाया।जड़-मूरख मन में भी, तुमने ज्ञान का दीप जलाया।सदा सिखाया बच्चों को करना आदर-सम्मान।ईश्वर से ऊँचा स्थान तुम्हारा, देते हो सबको सद्ज्ञान।किसी तरह का भेद न करते, तुम पर हमको…

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चीत्कार पर मौन है ज़माना

आज की राजनीति और सत्ता की भूख इतनी बेकाबू हो चुकी है कि उसने जनता की रोटी, ज़मीन और नौकरी तक निगल ली है। शासक वर्ग सबकुछ हड़पने के बाद भी संतुष्ट नहीं होता, मानो उन्हें किसी डकार तक की परवाह नहीं। आम इंसान का संघर्ष, उसका भूख-प्यास से जूझना, उनके लिए महज़ एक आँकड़ा या ख़बर बनकर रह गया है।

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डिजिटल मोहब्बत

आज मोहब्बत के तौर-तरीके बदल चुके हैं। अब प्रेम चिट्ठियों में नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर लिखे मैसेज और इमोजी में छुपे दिल के संदेशों में दिखाई देता है। कभी व्हाट्सएप कॉल से मुलाक़ात शुरू होती है तो कभी वीडियो चैट में जज़्बात उमड़ते हैं।

जहाँ पहले चाँद-तारों की बातें होती थीं, वहीं अब ऑनलाइन स्टेटस ही बहुत कुछ कह जाता है। “टाइपिंग…” का छोटा-सा शब्द भी दिल की धड़कनों को तेज़ कर देता है और चैट बॉक्स ही दिल के हालात का दर्पण बन जाता है।

सेल्फ़ी में मुस्कान, फिल्टर का जादू और रील्स में झलकता इश्क़ आज के रिश्तों की पहचान बन चुके हैं। कभी स्वाइप लेफ़्ट, कभी स्वाइप राइट — यही है मोहब्बत का नया डिजिटल अंदाज़।
फिर भी सच्चाई यही है कि दिल आज भी वैसा ही है जैसा पहले था। जिसे चाहा वही सबसे क़ीमती खजाना है। तकनीक और साधन बदल गए, तौर-तरीके बदल गए, पर प्यार का जादू आज भी उतना ही पुराना और उतना ही सुहाना है।

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पितरों की तस्वीर: कहाँ और कैसे लगाएं

घर में पितरों की तस्वीर लगाने का उद्देश्य सिर्फ स्मरण करना नहीं, बल्कि वास्तुशास्त्र के अनुसार सही दिशा और स्थान पर रखकर घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना है। गलत स्थान या दिशा पर तस्वीर लगाने से वास्तु दोष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए पितरों की तस्वीर को उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में, दक्षिण की ओर मुख करके रखना सर्वोत्तम माना जाता है।

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करतब दिखाते समय युवक बुरी तरह झुलसा,

फूल डोल चल समारोह के दौरान एक युवक करतब दिखाते समय बुरी तरह झुलस गया। घटना टॉवर चौराहे पर हुई, जहां अखाड़े का युवक गाड़ी पर चढ़कर मुंह में पेट्रोल डालकर आग के गोले बनाने का प्रदर्शन कर रहा था। इसी दौरान अचानक हादसा हो गया। प्रकाश नगर निवासी युवराज, पिता राजकुमार मरमट, इस हादसे…

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ग्रंथ रथ और मूषक वाद्य दल ने खींचा ध्यान

पुणे का गणेशोत्सव अपनी भव्य और रंगीन परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इस दौरान विभिन्न प्रकार के दृश्यात्मक प्रदर्शन, जीवंत दृश्य, धार्मिक, शिक्षाप्रद और सामाजिक विषयों पर आधारित प्रस्तुतियाँ होती हैं, साथ ही विसर्जन यात्रा की भव्य परंपरा भी देखने को मिलती है।

घर-घर आयोजित होने वाले गणेशोत्सव भी इस परंपरा से अछूते नहीं हैं। सुभाषनगर स्थित जेधे परिवार ने इस वर्ष भी एक शानदार दृश्य प्रस्तुत किया। उनके घर शुक्रवार को हुई विसर्जन यात्रा ने सभी का ध्यान खींचा।

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राग, ताल और नृत्य से गूँजा बालगंधर्व रंगमंदिर

आशाजनक कलाकारों को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से बीते 28 वर्षों से आयोजित किया जा रहा कावेरी परंपरा बालसंगीत महोत्सव इस वर्ष भी उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। जंगली महाराज रोड स्थित बालगंधर्व रंगमंदिर में हुए इस आयोजन में नन्हें कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को जीवंत करते हुए अनुशासित और प्रभावी प्रस्तुतियाँ दीं। पुणे फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गायक राहुल देशपांडे, सुप्रसिद्ध तबला वादक निखिल फाटक तथा विख्यात कथक नृत्यांगना शर्वरी जमेनीस मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर कन्नड़ संघ के अध्यक्ष कुशल हेगड़े, उपाध्यक्षा इंदिरा सालियान और कोषाध्यक्ष राधिका शर्मा भी मौजूद रहे।

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पिताजी और शिक्षक दिवस

मेरे लिए पिताजी ही जीवन के पहले शिक्षक थे। उनकी डाँट में करुणा थी और उनकी कठोरता में भी प्रेम छिपा था। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि सच्चाई, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ जीना सिखाया। अद्भुत संयोग यह रहा कि शिक्षक होकर वे इसी शिक्षक दिवस के दिन इस संसार से विदा हुए—और अपने जीवन से यह अंतिम संदेश छोड़ गए कि सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने आचरण और आदर्श से पीढ़ियों को दिशा देता है।

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राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

आज हम शिक्षक दिवस मनाते हैं—पर यह महज़ कैलेंडर की औपचारिक तारीख़ नहीं, एक विचार की परीक्षा है। इस दिन का अर्थ तभी पूरा होता है जब हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को किताबों के अध्याय से बाहर निकालकर अपने समय की नब्ज़ पर रख दें। वे केवल दार्शनिक, कुलपति या भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं…

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