नया दिन, नई आशा
सूरज की कोमल किरणों के साथ नया दिन, नई आशा और उमंग लेकर आता है। प्रकृति की हरियाली, कल-कल करती नदियाँ और चहकती चिड़ियाँ जीवन में प्रेरणा और ऊर्जा भरती हैं। साहस और मेहनत के साथ हर चुनौती को पार करना ही सफलता का मार्ग है।”

सूरज की कोमल किरणों के साथ नया दिन, नई आशा और उमंग लेकर आता है। प्रकृति की हरियाली, कल-कल करती नदियाँ और चहकती चिड़ियाँ जीवन में प्रेरणा और ऊर्जा भरती हैं। साहस और मेहनत के साथ हर चुनौती को पार करना ही सफलता का मार्ग है।”
“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”
“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”
वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।
वो शामें कभी कितनी खूबसूरत हुआ करती थीं समंदर के किनारे आपके कंधे पर सिर टिकाकर डूबते सूरज की लालिमा को निहारना, लहरों में उसका प्रतिबिंब देख थम-सा जाना। समुद्र की जलतरंगें भी तब मानो हमारे प्यार का सुर छेड़ती थीं। आपका हाथ मेरे हाथ में होता, तो लगता था जैसे सारी दुनिया हमारे भीतर सिमट आई हो। बच्चों की मासूम आवाजें, समंदर किनारे की हलचल सब कुछ अपनी जगह था, पर हमारे बीच एक शांत-सी खुशी बहती थी।
एक पेम में पानी पोतकर स्लेट पर अक्षर उकेरना यही तो हमारा पहला विद्यालय था। उंगलियों की पकड़, बाबूजी की बनाई लकीरों पर चलना, स्लेट का टूटना और फिर भी सीखने का हौसला… सब याद है। आज बच्चे टचस्क्रीन पर लिखते हैं, मगर हमें अक्षर पेम की खुरदरी चुभन से मिले थे। पानी पोतने से अक्षर मिटते थे, पर बचपन के सबक मन में उतनी गहराई से छप जाते थे कि आज भी स्मृतियों की स्लेट पर चमकते हैं। सच कहें तो हमने सिर्फ अ-आ नहीं सीखा था, हमने जीवन सीखा था।
निशा की नीरवता में बैठी नायिका प्रतीक्षा में लिपटी है .हवा में भीगी चाँदनी, शरीर पर ओस की बूँदें जैसे भावना का स्पर्श कर रही हों। वह प्रिय के आगमन की राह में सजी-संवरी है, मानो सावन स्वयं प्रेम का संदेश लेकर आया हो। मन में उमड़ती आशाओं से मोतियों का हार पिरोती, पलकें प्रतीक्षा की लाली से भीग उठी हैं।
हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना
भरोसा जीवन की वह डोर है, जो हमें स्वयं से लेकर दूसरों और अंततः ईश्वर तक जोड़ती है। विपरीत परिस्थितियों में जब अपने प्रयास नाकाफी पड़ जाएँ, तब किसी अपरिचित का बढ़ा हुआ हाथ ईश्वर जैसा लगता है। जीवन की यह राह आपसी विश्वास पर ही चलती है और अंत में भरोसा यही कहता है, “जो भी होगा, अच्छा ही होगा।”
एक दिन के लिए ‘पुस्तकों की राजधानी’ बन गया. शहर के स्कूलों, कॉलेजों, ऑफिसों, मेट्रो, बस स्टैंड, धार्मिक स्थलों और आईटी पार्कों में लोगों ने एक साथ किताबें खोलकर ऐसा माहौल बनाया, मानो पूरा शहर एक विशाल ओपन लाइब्रेरी में बदल गया हो. ग्रुप रीडिंग की लगभग १०,००० तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं और आयोजन को राजेश पांडे, रमेश पाटील, योगेश शिंदे, स्वाति देशमुख, प्रिया जाधव के नेतृत्व में ‘शांतता.. पुणेकर वाचत आहे’ अभियान को बड़ी सफलता मिली. शाम ५ बजे तक १ लाख ३५ हज़ार से ज़्यादा लोगों ने किताबें पढ़ीं और फोटो अपलोड करके वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया