नया कलेवर नया फ्लेवर
आज की युवा पीढ़ी को अक्सर लापरवाह समझ लिया जाता है, जबकि वे आत्मनिर्भर, संवेदनशील और सहयोगी होते हैं। यह लेख उनकी सोच, जीवनशैली और हमारे मार्गदर्शन की भूमिका को उजागर करता है।

आज की युवा पीढ़ी को अक्सर लापरवाह समझ लिया जाता है, जबकि वे आत्मनिर्भर, संवेदनशील और सहयोगी होते हैं। यह लेख उनकी सोच, जीवनशैली और हमारे मार्गदर्शन की भूमिका को उजागर करता है।
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग गणित पढ़ाः था हमने,अंक गिने, समीकरण सुलझाए,पर तुम्हें देखकर समझ आयाकुछ प्रश्न ऐसे होते हैंजिनका कोई हल नहीं,बस अनुभव होता है|कविताएँ शब्दों से बनती हैं,शब्द अर्थ खोजते हैं,पर तुम्हारी मुस्कानबिना शब्दों केपूरी कविता कह जाती है|गैलीलियो, तुम सच कहते होईश्वर ने ब्रह्मांडगणित की भाषा में लिखा है,पर मेरे हृदय का आकाशउसने…
आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।
आज मन उदास है। रोशनी चुभती है, सितारे दिखना भी नहीं चाहते। वह अकेलेपन में बांसुरी की धुन में शांत होना चाहता है, जहाँ कोई सुनने वाला नहीं और सिर्फ यादें साथ हों।
यह कविता प्रेम के उस रूप को उजागर करती है जहाँ चाहने वाला टूटता है और जाने वाला वादा लेकर चला जाता है। शब्दों में ठहरा दर्द और अधूरा इंतज़ार इसकी आत्मा है।
पैसा कम था, पर अपनापन भरपूर था। गली-मुहल्ले रिश्तों से भरे थे, और मुस्कानें दिखावे से नहीं, दिल से उपजती थीं।
यह रचना पूर्णिमा की रात के एक दुर्लभ दृश्य को माँ की लोकबोली से जोड़ती है। चाँद सिर्फ आकाशीय पिंड नहीं रह जाता, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और भाषा के स्नेहिल स्पर्श में बदल जाता है—जहाँ “पूर्णिमा” माँ के लिए “पुन्नो” बन जाती है।
नागपुर की प्रतिष्ठित कवयित्री मेघा मनोज अग्रवाल को समाजसेवा, हिंदी लेखन और उनकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए राज्यस्तरीय नारी रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान श्याम बहुउद्देशीय विकास संस्था की ओर से देवरी में आयोजित भव्य समारोह में संस्था के संस्थापक डॉ. घनश्याम निखाड़े द्वारा प्रदान किया गया। इस उपलब्धि से नागपुर का नाम गौरवान्वित हुआ है।
जैसा कि वेद-पुराणों में वर्णित है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् मनुष्य जीवन की प्राप्ति होती है। कहा गया है “जनमत मरत दुःसह दुख होई।”
प्राणी जब एक बार जन्म लेता है और मरता है, तब लाखों बिच्छुओं के डसने जैसी पीड़ा सहनी पड़ती है। बड़े सत्कर्मों के फलस्वरूप विवेकशील प्राणी मानव रूप में इस नश्वर जगत में जन्म लेता है।
ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.