सागर तुम्हीं दिखाओ कोई रास्ता…
लहरों, तूफ़ानों और गहराइयों के माध्यम से सागर से संवाद करती यह कविता जीवन के संघर्ष, धैर्य और हर हार के बाद नई शुरुआत का साहस देती है।

लहरों, तूफ़ानों और गहराइयों के माध्यम से सागर से संवाद करती यह कविता जीवन के संघर्ष, धैर्य और हर हार के बाद नई शुरुआत का साहस देती है।
सिगड़ी की गर्माहट, मैया का स्नेह, ताई जी का अनुशासन और मम्मी की टोका-टाकी संयुक्त परिवार के वे दिन आज भी दिल को छू जाते हैं। यह संस्मरण बचपन, संस्कार और रिश्तों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर सीख स्नेह के साथ मिली।
कवि गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ को याद करना केवल एक रचनाकार को स्मरण करना नहीं, बल्कि उस युग को पुनः जीवित करना है, जिसमें कविता जीवन का उत्सव और संघर्ष का स्वर थी। मुंबई में आयोजित ‘शताब्दी स्मरण’ कार्यक्रम में साहित्यकारों ने नीरज के काव्य, व्यक्तित्व और गीतों के विविध आयामों पर विचार रखे।
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी अनामिका की पुरानी डायरी उसके अधूरे सपनों और दबे संघर्षों की गवाह है। जब वह फिर से लिखना शुरू करती है, तो उसका संघर्ष उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी रचनात्मक शक्ति बन जाता है। यह कहानी हर उस स्त्री की आवाज़ है, जो चुपचाप सृजन करती है।
परिस्थितियाँ हमारे जीवन की दिशा तय नहीं करतीं, बल्कि हमारी सोच उन्हें अर्थ देती है। एक ही स्थिति में कोई टूट जाता है और कोई निखर जाता है अंतर केवल मानसिकता का होता है। जब मन में विश्वास होता है, तब कठिन रास्ते भी सहज हो जाते हैं। जीवन को बदलने के लिए पहले दृष्टिकोण को बदलना आवश्यक है।
तुम मेरे जीवन का वह विश्वास हो, जो अँधेरों में भी राह दिखाता है। जब संसार डगमगाता है, तब तुम्हारी मौजूदगी मुझे स्थिर रखती है। यह साथ किसी वचन या शपथ से बड़ा है. यह आत्मा की स्वीकृति है, जहाँ भय का कोई स्थान नहीं। तुम्हारे इश्क़ में मुझे सुकून मिला है, ऐसा सुकून जो प्रश्न नहीं करता, केवल स्वीकार करता है। हम दो शरीर नहीं, एक ही चेतना के विस्तार हैं तुम मेरी साधना हो और मैं तुम्हारी आस्था। इसी निष्कपट प्रेम में जीवन की हर कठिनाई सहज हो जाती है, और हर पथ आलोकित।
ह कविता क्रिकेट के मैदान में उतरती लड़कियों के माध्यम से महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों के टूटने की कथा कहती है। चौके-छक्कों से लेकर इतिहास रचने तक, यह रचना बताती है कि खेल कैसे करोड़ों लड़कियों के भीतर साहस और आकाश छूने की आकांक्षा जगा रहा है।
यह कविता न बचपन और न जवानी की उस मध्यांतर अवस्था को स्वर देती है, जिसे किशोरावस्था कहा जाता है। बदलती आदतों, माता-पिता की अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच फँसे किशोर मन की उलझन और पीड़ा को यह रचना संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है।