बिदाई

-गीता गैरोला मैं पतझड़ में खड़ा पेड़ हूं जिसे अपनी पत्तियों को विदाई देनी है जन्म के लिए मृत्यु उतनी ही जरूरी है जितनी मृत्यु के लिए जन्म जरूरी है मैं अपनी मिट्टी में उत्तप्त ऐसे खड़ी हूं जैसे मरने से पहले कोई प्रेम करने को आतुर खड़ा हो  या मरने के तुरंत बाद जीवन…

Read More

खूंटी पर टंगी संवेदना..

लोग घर की खूँटी पर टांग कर निकलते हैं संवेदना… और फिर उन्हें नहीं फर्क पड़ता सड़क किनारे हो रहे हादसों से उन्हें नहीं फर्क पड़ता की एक युवक बार बार घोप रहा है हाथ में लिये अपने औजार को किसी युवती पर जो तड़प रही है दर्द से… लोग एक दूसरे को देखते हैं…

Read More