
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
फिर कोई कहानी याद आई।
फिर कोई फ़साना याद आया।
फिर आज हमारी आँखों को
गुज़रा वो ज़माना याद आया।
मैया, ताई जी, मम्मी हमारे थरड़ परिवार की मज़बूत स्तंभ और हमारे बीते दिनों की यादें, जो इतनी मधुर हैं कि जब भी याद आती हैं, आँखों में हल्की-सी नमी, होठों पर मुस्कान तथा दिल में कसक ले आती हैं। एक ही बात मुँह से निकलती है कि
दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ।
वह पत्थर के कोयले की सिगड़ी, जिसे ताई जी और मम्मी रात में ही भरकर रख देती थीं। सुबह-सुबह उस पर होता गरम पानी। एक ही बाथरूम में नहाने के लिए हमारा नंबर लगना और पानी को छू-छूकर बार-बार देखना उन दिनों यह सबसे ज़रूरी काम होता था हमारा, क्योंकि नहाए बगैर कुछ भी खाने नहीं मिलता था। हमारी रोज़ की दिनचर्या में शामिल थीं हमारी ताई जी, जिनके बिना न तो हमारी सुबह होती थी, न ही रात। ताई जी ज़ोर-ज़ोर से बोलती थीं। कड़वा बोलती थीं, पर दिल उनका सोने जैसा था। उनकी कड़वाहट के पीछे भी हमारे भविष्य के हित की मिठास छुपी थी। क्या मजाल जो कोई चीज़ हम इधर से उधर रख दें. बस शुरू हो जाती थीं वे।
वे हमेशा एक ही बात कहती थीं-“चीज़ें व्यवस्थित रखने से समय बच जाता है और कोई परेशानी नहीं होती। अँधेरे में भी आप अपनी चीज़ निकाल सकते हैं।”
वही आदतें आज हम में रच-बस गई हैं, पर सच बात तो यह है कि आज हम उनकी तरह किसी से कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि आज किसी को कहा बर्दाश्त नहीं होता। मम्मी की टोका-टाकी से भी हम परेशान रहते थे, पर जब कभी हम परेशान होते, हम पहुँच जाते मैया के पास अपनी-अपनी शिकायतें लेकर।
“मैया” यानी हमारी दादी, जिनकी जान बसती थी हम पोते-पोतियों में। सबकी बातें शांति से सुनकर हर किसी को बड़े प्यार से तसल्ली देती थीं। यूँ तो हर दादी की जान अपने पोते-पोतियों में बसती है, यह बात मैं दादी बनकर ही समझ पाई हूँ। पर हमारी दादी जैसी कोई नहीं। घर में उनका एडमिनिस्ट्रेशन ग़ज़ब का था। हर त्यौहार पर सुबह-सुबह मैया कढ़ाही के सामने तलने का काम लेकर बैठ जाती थीं। जब हम सुबह उठते, तो बूंदी, भुजिया, मठरी के बड़े-बड़े टोकरों भरे नज़र आते। उन दिनों रेडीमेड या हलवाई बुलाकर बनवाने का प्रचलन कम था। बस हर मौके पर मम्मी, ताई जी के साथ मैया सिगड़ी के सामने बैठकर तलने का काम करती थीं।
वे गोरी तो थीं ही, सिगड़ी की गर्माहट से उनके चेहरे का गुलाबीपन बढ़ जाता और हम कहते-“मैया, तू तो कितनी गुलाबी हो गई।”तो वे हँसने लगतीं।
उन दिनों बग़ैर नहाए हमारा चौके को छूना वर्जित था। हम ललचाई नज़रों से बनी सारी चीज़ें देखते रहते और सोचते कब नहाएँ, कब पूजा हो और कब हमें यह सब खाने को मिले। आज के बच्चे यह सब नहीं समझ सकते, क्योंकि उनके चाहने से पहले ही हर चीज़ उन्हें मिल जाती है। आसानी से उपलब्ध होने वाली चीज़ें अपनी अहमियत खो देती हैं। हालाँकि कहीं-कहीं आज भी घरों में नमकीन और मिठाइयाँ बनाई जाती हैं।
मैया ने तो घर में ही सब्ज़ी मंडी बना रखी थी। बेंत की टोकरियों में सब्ज़ियों को सजाकर, उन्हें बोरे से ढककर, दिन में कई बार पानी के छींटे देते रहना उनका सबसे प्रिय काम था और उन्हें निहारते रहना हमारा प्रिय काम। बग़ैर फ्रिज के सात दिनों तक सभी सब्ज़ियाँ तरो-ताज़ा रहती थीं। मैया ने हमेशा दूसरों की चिंता की। हमेशा कहती थीं. आत्मा-परमात्मा सबकी एक ही है। मैया की भगवान से हमेशा बातचीत चलती रहती थी। जो भी काम करतीं, उन्हें बतलाते हुए कहतीं “ठाकुर जी, अब मैं नहा रही हूँ। अब मैं खाना खा रही हूँ।”
हमें बहुत अजीब लगता, पर उनका भक्ति-भाव हमें बाद में बहुत कुछ समझा गया।
मुझे याद है, ठंड के दिनों में अपने कमरे में सिगड़ी रखकर वे हाथ तापती रहती थीं। हम सब भी उन्हें घेरकर बैठ जाते थे। वह गर्माहट आज कहीं नहीं मिलती, क्योंकि घरों में आज सिगड़ी ही नहीं होती। सिगड़ी से ज़्यादा एक साथ बैठकर हँसी-मज़ाक करना बहुत याद आता है। मैया कभी डॉक्टर के पास नहीं गईं। आख़िरी समय तक उनके सारे दाँत सही-सलामत थे और एक बाल भी सफ़ेद नहीं हुआ था। मैया अपने आप में बहुत अच्छी डाइटिशियन थीं। दिन में तीन बार बहुत ज़्यादा शक्कर वाली ब्लैक टी पीती थीं, पर एकदम कम मात्रा में। हर दो घंटे में कुछ-न-कुछ खाती रहती थीं कभी भुनी हुई मूँगफली, कभी पालक की सब्ज़ी, कभी ताल मखाना और कभी सीज़नल फ्रूट्स। उनसे ही हमने सीखा क्वांटिटी ऑफ़ फ़ूड और क्वालिटी ऑफ़ फ़ूड क्या होता है।
गणगौर आने पर रात में गाए जाने वाले गीत जब बुलंद आवाज़ में गाए जाते थे, तो हम सब भी सुर में सुर मिलाने लगते थे, क्योंकि घर के बड़े जेंट्स लोगों का नाम लेने के लिए उन्हें हमारी ही ज़रूरत पड़ती थी। यह काम हमें बहुत मुस्तैदी से करना पड़ता था। ज़रा-सी चूक पर सुनने मिल जाता था.“इतना-सा काम भी तुम लोग बराबर नहीं कर सकते।”
पर पूरे परिवार के बड़े बेटे-दामाद से लेकर बहू-बेटी तक को याद रखना वाकई कमाल का होता था। इसलिए मुझे गणगौर बहुत पसंद है, क्योंकि इस त्यौहार के गीतों के माध्यम से हम अपनी पीढ़ी को एक-दूसरे से जोड़ सकते हैं, वरना परिवार के लोगों का नाम किसी को याद नहीं रहेगा। आज एकल परिवार का ज़माना है, पर गणगौर में दूर रहते हुए भी मानो सब गीतों के माध्यम से साथ-साथ हो जाते हैं।
बचपन की गर्मियाँ हमारी बेहद ही खूबसूरत होती थीं। गर्मियों में शाम के समय छत पर जाकर बाल्टियों से खूब पानी उँडेलना, ताकि फर्श ठंडी हो जाए। रात में जल्दी जाकर बिस्तर लगाना, ताकि गद्दी ठंडी मिले। लाइन से लगे बिस्तरों पर गुलाटी खाकर जो मज़ा आता था, वह निशब्द है। छत में डाले जाने वाले बिस्तरों की जगह ही हमारी प्रॉपर्टी होती थी और उसके लिए कई बार आपस में लड़ पड़ते थे कि “ये तो हमारी जगह है।”
आज सोचती हूँ तो हँसी आती है कि कितनी मासूम लड़ाइयाँ थीं हमारी। मैया के साथ लिपटकर सोने के लिए भाई-बहनों से की गई लड़ाइयाँ, नहाने के लिए चाचा जी से की गई तकरार मुझे हमेशा याद आती हैं। मस्ती-मस्ती में हर बार कोई-न-कोई सीख मिल जाती थी। सच बात तो यह है कि हमारे बुज़ुर्ग हमारे बेस्ट एडवाइज़र होते हैं। उनका दिखाया रास्ता हमें हमेशा सही दिशा देता है, जिससे हमारी ज़िंदगी की दशा भी सही रहती है। अनुशासन में रहते हुए हर काम को सही तरीके से अंजाम देना हमें विरासत में ही मिल जाता है, अगर हमारे बुज़ुर्ग हमारे साथ हों। उनकी सीख ज़िंदगी भर हमें संस्कारवान और सहनशील बनाए रखती है। मैं तो जब कभी थकती हूँ या परेशान होती हूँ, तो उन्हीं की बातें याद करती हूँ कि किस तरह वे आख़िरी समय तक जोश के साथ जीते रहे। अपने कर्तव्य से कभी नहीं थके और मुझमें एक नई ऊर्जा भर जाती है।
नमन उन सभी को।
विजया जी
आपने संयुक्त परिवार में परवरिश की महत्ता का बहुत सजीव और संवेदनशील वर्णन किया है।
आज की पीढ़ी इस लेखन से बहुत कुछ सीख सकती है। सबसे अधिक , परिवार के कमज़ोर और बूढ़े व बच्चे सही देखरेख में जीवन बिता सकते हैं , एक दूसरे की भी देखभाल कर सकते हैं।
आपको बहुत-बहुत बधाई।