पून्नो का चाँद

पूर्णिमा की शांत रात में भारतीय शहर की एक संकरी गली, सामने खेतों के ऊपर उगता सुनहरी रोशनी से दमकता चाँद, धुंध में नहाया स्ट्रीट लाइट और हल्की एम्बर रोशनी में चमकते घर; माहौल में सादगी, स्मृति और अपनापन झलकता है।

सुनीता मलिक सोलंकी, प्रसिद्ध लेखिका, मुज्जफरनगर

रात में शहर शांत था।
पूर्णिमा का चाँद
सामने की गली में,
खेत की ओट से
धीरे-धीरे
थोड़ा ऊपर उग आया था।

गहरी एम्बर रोशनी में
चमकता,
गली का हर मकान
खूबसूरत लग रहा था।
खंभे पर लगे बल्ब की
रोशनी
धुंध से होकर गुजर रही थी।

न कोई फ़िल्टर,
न किसी किस्म का प्रभाव
बस
सही समय,
सही वातावरण।

उस दिन गली में
एक दुर्लभ दृश्य उतरा था,
और मैं
उसे कैद कर पाई थी।

भीतर आई,
माँ को दिखाया।
माँ ने देखते ही कहा
“आज पुन्नो का चाँद है।”

माँ
पूर्णिमा को
पुन्नो कहती थी।

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